संदेश
जगत के मालिक - गीत - महेश कुमार हरियाणवी
सबका एक विधाता जग में, जिसके सारे विधान। आत्मा सत के साथ सदा से, दल बदले इंसान।। जगत के मालिक हैं भगवान। जगत के मालिक हैं भगवान।। जगत …
इतने ज़हीन और ये इतने हसीन लोग - ग़ज़ल - प्रशान्त 'अरहत'
तक़ती : 221 2121 1221 212 इतने ज़हीन और ये इतने हसीन लोग मिलते कहाँ हैं आप–जैसे बेहतरीन लोग करते थे रोज़ कॉल जो सोते थे बाद में करते…
अंतिम परीक्षा - कविता - साई अनमोल
जुटी सभा बैठी है मौन ताँक रही यह अबला कौन? सूरज-चार बुझे बैठे देखे ये कौन, जो हैं देखें, विद्वान-मुनि पद पर आसीन सीमाओं में भी बंधते…
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? - कविता - अमृता वर्मा
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? मन में इतना दर्द छुपाए, औरों पर एहसान जताए, नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? ख़ून पिलाकर जिसको पाला, वहीं नर्क…
युवा आक्रोश और टूटता भरोसा, कोलंबो से जालंधर तक - आलेख - डॉ॰ कपिल कुमार
पिछले शनिवार की रात को, जालंधर में, एक अफ़वाह यूनिवर्सिटी कैंपस में कुछ इतनी तेज़ी से फैली की सच्चाई उसे पकड़ नहीं पाई। और कुछ ही घंटे म…
ग्रह दोष - लघुकथा - कुमार नवीन
बस्ती से शहर की ओर जाने वाली सड़क के पहले ही मोड़ पर ज़मीन पर आसन जमाए पंडित जी बैठते थे। जो भी दुखी ग्राहक आता, पत्रा देखकर उसके ग्रह द…
मैं लिखूँगा - कविता - देवा यादव
मैं लिखूँगा, और तब तक लिखूँगा, जब तक मेरी उँगलियाँ साथ देगी। जब तक मेरी आत्मा न मात देगी।। मैं लिखूँगा, लिखूँगा वो सब, जो शायद तुम कह…
क़लम का सूर्य - कविता - जयदेव नारायण दास
अज्ञान के घने कुहासे को, जो पल में दूर भगाता है। वो स्याही की हर एक बूँद से, नव भोर का गीत सुनाता है। न झुका कभी जो सत्ताओं से, न भय …
आसमानी धरातल - कविता - मीनाक्षी पँवार
आसमाँ के पास भी है अपना धरातल, जहाँ पर उछलते-थिरकते हैं बादल, जहाँ डगमगाते हैं पंछी पवन में, तड़ित के तरुवर हैं झूले गगन में, जहाँ जन्…
अधूरी नज़्म - नज़्म - अनमोल
कल से एक अधूरी नज़्म लिखे बैठा हूँ बात है इसमें कुछ मेरी और कुछ तुम्हारी अपनी सारी बातें मैंने लिख रखी हैं कैसे काटी मैंने बिन तेरे सब…
अब हो प्रयाण - कविता - डॉ॰ विकास मोहन गुप्ता
अब हो प्रयाण मृत्यु अंत नहीं, है अवसर होता देहान्तर है क्षण भर मात्र साधन निर्जीव काया जन्म की प्रेरक है माया करती योनि योनि धारण आत्म…
बेटी आँगन में - कविता - सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
तेरे आने से महका ये आँगन, खिल उठीं फ़िज़ाएँ। तेरे बिना सब था सूना-सूना, तू मुस्कराए, बादल भी खिल जाएँ। इस आँगन में तेरे क़दम जैसे लक्ष्…
अनोखी हलचल - डायरी लेखन - ईशांत त्रिपाठी
०८ सितंबर २०२६ (वाराणसी) मंगलवार भोलूराम जी, थकान हो जाती है कभी-कभी अध्यात्म की किताबें पढ़कर और वैसी बातें सुनकर। पर भगवान भी निराल…
कभी हम पे चलता था सिक्का तुम्हारा - ग़ज़ल - सोनू यादव
अरकान : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन तक़ती : 122 122 122 122 कभी हम पे चलता था सिक्का तुम्हारा मगर अब नहीं है वो रुतबा तुम्हारा तिरे…
मगध का महान सम्राट - कविता - स्वीटी कुमारी सिन्हा
क्रूर नृप घनानंद के क्रूरता से, मगध का सिंहासन डगमगाया था। चीख़ती चिल्लाती प्रजा के मन में, मौर्यवंश ने एक उम्मीद जगाया था। गुरु चाणक्य…
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