संदेश
क़लम का सूर्य - कविता - जयदेव नारायण दास
अज्ञान के घने कुहासे को, जो पल में दूर भगाता है। वो स्याही की हर एक बूँद से, नव भोर का गीत सुनाता है। न झुका कभी जो सत्ताओं से, न भय …
आसमानी धरातल - कविता - मीनाक्षी पँवार
आसमाँ के पास भी है अपना धरातल, जहाँ पर उछलते-थिरकते हैं बादल, जहाँ डगमगाते हैं पंछी पवन में, तड़ित के तरुवर हैं झूले गगन में, जहाँ जन्…
अब हो प्रयाण - कविता - डॉ॰ विकास मोहन गुप्ता
अब हो प्रयाण मृत्यु अंत नहीं, है अवसर होता देहान्तर है क्षण भर मात्र साधन निर्जीव काया जन्म की प्रेरक है माया करती योनि योनि धारण आत्म…
बेटी आँगन में - कविता - सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
तेरे आने से महका ये आँगन, खिल उठीं फ़िज़ाएँ। तेरे बिना सब था सूना-सूना, तू मुस्कराए, बादल भी खिल जाएँ। इस आँगन में तेरे क़दम जैसे लक्ष्…
मगध का महान सम्राट - कविता - स्वीटी कुमारी सिन्हा
क्रूर नृप घनानंद के क्रूरता से, मगध का सिंहासन डगमगाया था। चीख़ती चिल्लाती प्रजा के मन में, मौर्यवंश ने एक उम्मीद जगाया था। गुरु चाणक्य…
अंतिम विदाई - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब दी हमें अंतिम विदाई जब तुम्हारे नेत्र से प्रिये, अश्रु की वो धार आई। प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब, दी हमे…
अपने आप से घबरा गया हूँ - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
अपने आप से घबरा गया हूँ, छाया से धूप में आ गया हूँ। मेरे अपने से कुछ सवाल थे, जैसे अँधेरे में मशाल थे। दूजों से बच चलता रहा, बस अपनों …
गहरा सन्नाटा - कविता - प्रवीन 'पथिक'
कभी कोई रात इतनी उदास होती है जैसे ग़म के सागर में डूबी अन्यमनस्क, अपलक, अतीत में ढूॅंढ रही हो कुछ! जिसका चित्र मानस में सजीव होता है। …
सब चींटी है - कविता - बिंदेश कुमार झा
मेरे पैरों के नीचे एक छोटी-सी सुरंग थी, जहाँ चींटियों की फ़ौज में ग़ज़ब की उमंग थी। किसी के हाथ में फूल था, तो किसी के हाथ में मिठाई, क…
बेटियाँ - कविता - प्रमोद कुमार
छनन-छनन छुम सुनते ही दिल ख़ुश हो जाता है। देख सुखद भविष्य के सपने मन कहीं खो जाता है। सोन चिरईं-सा घर-आँगन बीच ठुमक-मटक जब चलती हैं– ख़ू…
कैसे तुम्हें बुलाता भला? - कविता - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
शब्द तुम, छन्द तुम, गीत और राग तुम बेसुध-सा आलाप ले-ले मैं तुम्हें गाता रहा कभी तो समझोगी मेरे निर्मल मनोभावों को बस अपने मन को यही मै…
अंकुरण फिर लौट आए - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे अश्रु दल जब, अंजुरी को भेद पाए। अंकुरण फिर लौट आए। हो गया आँगन सहर्षित, आश्रुओं ने जीत देखी। पल्लवों के स्वप्न जागे, …
फिर भी - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
बहुत भीड़ है, फिर भी तपिश अकेलेपन की। दूर आकाश में, और निर्जन वन में, कोई वैमनस्यों को लेकर, साधक, अपने को साधने चला। वहाँ विवादों की …
भ्रम - कविता - मदन लाल राज
प्याज छीलने वाले को संदेह था कि– छिलके के नीचे छिलका होगा। और प्याज को ये भ्रम है कि– छिलका परत दर परत होगा। एक छीलता है तो दूसरा छिलत…
हे मेरे नन्हें दीपक - कविता - साई अनमोल
हे मेरे नन्हें दीपक तुझे जलना बारम्बार! तम में यह जीवन पला है पलकों पर आँसू गला है, इस पुतली की वर्ती से ही तुझको करना प्यार! तुझे जलन…
ज़िंदगीनामा - कविता - अमृत 'शिवोहम्'
ज़िंदगी क्या है? दिए की लौ का जलना? या तेज़ हवा में लौ का डगमगाना? या डगमगाती लौ को हथेलियों से बचाना? या बचाते-बचाते हथेलियों का जल ज…
छोड़ना - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
'छोड़ना' अति आवश्यक है, नयापन प्राप्त करने के लिए। जब फूल छोड़ते हैं डाली तो वे ईश्वर पर चढ़कर धन्य हो जाते हैं, जब बूँदें छो…
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