युवा आक्रोश और टूटता भरोसा, कोलंबो से जालंधर तक - आलेख - डॉ॰ कपिल कुमार

युवा आक्रोश और टूटता भरोसा, कोलंबो से जालंधर तक - आलेख - डॉ॰ कपिल कुमार
पिछले शनिवार की रात को, जालंधर में, एक अफ़वाह यूनिवर्सिटी कैंपस में कुछ इतनी तेज़ी से फैली की सच्चाई उसे पकड़ नहीं पाई। और कुछ ही घंटे में हज़ारों छात्र सड़कों पर उतर आए जिन्होंने कैंपस में तोड़फोड़ और आगजनी शुरू कर दी। साथ ही एक हाईवे को पूरी तरह से जाम कर दिया। मुझे यह दृश्य अब कुछ ज़्यादा जाना पहचाना लगने लगा है, पूरे दक्षिण एशिया में चाहे वह कुछ महीने पहले काठमांडू में जलती हुई संसद हो या फिर दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले महीने उग्र भीड़ और उसका हिंसक स्वरूप हो या फिर इससे पहले ढाका और कोलंबो की सड़कों पर उपद्रव, यह एक ऐसी नई पीढ़ी है जो अपनी संस्थाओं पर से धैर्य खोती जा रही है। 

जालंधर वाली घटना अपने आप में अकेली नहीं है बल्कि पिछले चार-पाँच सालों में साउथ एशिया में एक पैटर्न सा बना है। 2022 में श्रीलंका से यह शुरू हुआ फिर 2024 में बांग्लादेश में, इसके बाद 2025 में नेपाल और अब 2026 में भारत की बारी है। स्पष्ट दिखता है कि इस इलाके में कोई ना कोई देश युवाओं के इस प्रकार के ग़ुस्से का किसी न किसी रूप में सामना कर रहा है वास्तव में यह हर बार दोहराया जाने वाला क्षेत्रीय पैटर्न है न की एक अकेली घटना। 

श्रीलंका में 2022 के दौरान एक भीषण आर्थिक संकट आया जिस कारण से श्रीलंका में ईंधन के लिए लंबी-लंबी लाइन लगने लगी, बिजली कटौती होने लगी, खाद्य सामग्री के दाम आसमान छूने लगे, श्रीलंका की मुद्रा निचले स्तर पर आ गई और आयात के लिए ज़रूरी विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आ गई। इस हताशा ने अरगलया आंदोलन को जन्म दिया। जिसका सिंहली भाषा में मतलब संघर्ष होता है। वहां के युवाओं की भारी नाराजगी का परिणाम यह हुआ कि वहां की संसद पर युवाओं ने क़ब्ज़ा कर लिया और राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षी को देश छोड़कर भागना पड़ा। 

2024 में बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में स्वतंत्रता सेनानियों के कोटा सिस्टम की पुन बहाली के ख़िलाफ़ छात्र आंदोलन शुरू हो गया। छात्रों को यह लगा कि इस पुरानी व्यवस्था के लागू होने से उनके साथ भेदभाव होगा। शुरुआत में यह प्रदर्शन छात्रों तक सीमित रहा परंतु देखते ही देखते कुछ दिनों में इसमें विपक्षी दाल और कट्टरपंथी सोच रखने वाले समूह शामिल हो गए और यह पूरे देश में फैल गया, वहीं सरकार के अहंकार पूर्ण रवैय ने आग में घी का काम किया। 5 अगस्त को प्रधानमंत्री शेख हसीना को मजबूर होकर इस्तीफ़ा देकर हेलीकॉप्टर से देश छोड़ना पड़ा और भारत में शरण ली।

पिछले वर्ष नेपाल में सितंबर 2025 के दौरान जेन ज़ी विद्रोह हुआ। यहाँ के युवा भ्रष्टाचार भाई भतीजावाद बेरोज़गारी और एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध से बेहद नाराज़ थे उन्हें यह लगा कि उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है। प्रारंभ में यह विद्रोह ऑनलाइन था लेकिन जल्द ही युवा सड़कों पर उतर आए और उनका ग़ुस्सा इतना बड़ा की प्रदर्शनकारियों ने अपने देश की ही संसद भवन में आग लगा दी। नतीजेतन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा। 

यह पैटर्न अब भारत तक पहुँच चुका है यद्यपि यहाँ कहानी थोड़े अलग रंगों में सामने आ रही है। जून-जुलाई में पेपर लीक की घटनाओं और परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर सोशल मीडिया पर जन्मी एक नई पार्टी ने महीने भर प्रदर्शन किया। जहाँ छात्रों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की स्थिति की माँग की और फिर संसद भवन की और कूच करते हुए आगजनी और हिंसा की गई। आईआईटी दिल्ली में एक छात्र की मौत को लेकर भी विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। इसी महीने सितंबर में आईआईटी बॉम्बे में एक छात्र की मौत पर छात्रों का आक्रोश हम देख ही चुके हैं। और सबसे ताज़ा घटना पंजाब के जालंधर में एलपीयू में सोशल मीडिया में एक अपुष्ट अफ़वाह के बाद रातों-रात ज़बरदस्त हिंसक प्रदर्शन और कैंपस में आगजनी और हाईवे जाम की देखने को मिलती है। 

आखिर यह पैटर्न बार-बार क्यों देखने में आ रहा है? भारत के लिए यह और भी गहरी चिंता का विषय है। क्योंकि भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है जिसे डेमोग्राफिक डिविडेंड कहा जाता है अर्थात एक बड़ी संभावित युवा शक्ति। लेकिन अगर यही युवा दिशाहीन होकर ग़ुस्से से भरे बैठे हो और सिस्टम पर भरोसा खो बैठे तो यही डिविडेंड एक डेमोग्राफिक ख़तरे में बदल सकता है।

मेरी नज़र में इसके पीछे 4 प्रमुख वजह दिखाई पड़ती है। पहली, युवाओं का संस्थानों पर भरोसे का लगातार काम होना क्योंकि जब शिकायतें बार-बार अनसुनी करी जाती हैं तो कुछ समय बाद धैर्य ख़त्म जवाब देने लगता है। दूसरी, आजकल सोशल मीडिया की रफ़्तार इतनी तेज़ है कि जो किसी भी अपुष्ट ख़बर या अफ़वाह को कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँचा देती है। तीसरी, बेरोज़गारी और युवाओं का किसी सकारात्मक एक्टिविटीज में संलग्न न होना, अवसरों की कमी के कारण हर साल लाखों ग्रैजुएट्स नौकरियाँ प्राप्त नहीं कर पाते हैं। और चौथी, शिक्षा व्यवस्था के ढाँचे में गंभीर ख़ामियाँ जो परीक्षाओं और रटने पर इतनी केंद्रित है कि संवाद, आलोचनात्मक सोच प्रकट करने का अवसर छात्रों को कम ही मिल पाता है। अगर यह असंतोष इसी तरह बढ़ता रहा तो बिना किसी ठोस दिशा एवं बिना किसी नीतिगत जवाबदेही के आने वाले वर्षों में यह और बड़े आंदोलन या आस्थिरता का रूप ले सकता है। 

दरअसल, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और अब भारत की यह घटनाएँ अलग-अलग नहीं बल्कि हमें एक साझा चेतावनी देती है। यदि ग़ौर से देखें तो प्रत्येक देश में ट्रिगर प्वाइंट अलग था कहीं पर आर्थिक संकट, कहीं पर कोटा व्यवस्था के प्रति असंतोष, कहीं सोशल मीडिया पर नियंत्रण और प्रतिबंधित करना और कहीं परीक्षा गड़बड़ियाँ लेकिन एक चीज़ साफ़ है वह यह कि इसकी जड़ एक ही है, युवाओं का अपनी संस्थाओं पर से भरोसा उठ जाना। 

वास्तव में भारत को यह सभी घटनाएँ एक चेतावनी की घंटी के रूप में देखनी चाहिए न की किसी दूर देश की सामान्य ख़बर की तरह। जब तक देश की शिक्षा व्यवस्था के ढांचे में परिवर्तन, रोज़गार के अवसर, और सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत जवाबदेही में सुधार नहीं होता, इस प्रकार का असंतोष कभी भी विकराल रूप ले सकता है। सरकार समेत सभी संस्थाओं को चाहिए कि वह समय रहते युवाओं से संवाद करें और सुधार का रास्ता शीघ्र तलाशें, उसे टाले नहीं। इस पीढ़ी का भरोसा दोबारा जीतने का यही एकमात्र तरीक़ा है।

डॉ॰ कपिल कुमार - जयपुर (राजस्थान)

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