ईशांत त्रिपाठी - मैदानी, रीवा (मध्य प्रदेश)
अनोखी हलचल - डायरी लेखन - ईशांत त्रिपाठी
सोमवार, सितंबर 28, 2026
०८ सितंबर २०२६ (वाराणसी)
मंगलवार
भोलूराम जी,
थकान हो जाती है कभी-कभी अध्यात्म की किताबें पढ़कर और वैसी बातें सुनकर। पर भगवान भी निराले ही हैं; बच्चे का मन टटोलकर वे ऐसा अभ्यास सत्र भी रख दिया करते हैं ताकि यह पता चल सके कि जो कुछ पढ़ा और जाना है, वह जीवन में लागू कितना हो पा रहा है।
उमस से भरी दोपहर में मैं कक्षा के भीतर अध्ययन कर ही रहा था कि एक मित्र ने आकर मुझसे मल्टी-पर्पज हॉल के विषय में पूछा। मैंने उसे दिशा बताते हुए अपनी जिज्ञासा ज़ाहिर की कि वहाँ क्या हो रहा है? मालूम हुआ कि शतरंज का खेल चल रहा है। मैं पुनः अपने अध्ययन में लग ही पाता कि तभी एक सहपाठी मुझसे सस्नेह मिलने आया और मुझे भी शतरंज के खेल में शामिल होने को बोला। अब मैं भी महत्वाकांक्षी कोई कम हूँ जो ठहर जाता, सो तुरंत उसके साथ चल पड़ा।
मैं खेल में अपनी बाज़ी खेलने लगा और शुरुआत में मेरी जल्दी ही जीत हो गई। वहाँ नियम था कि जीतने वाला पक्ष अपने से अधिक समझ वाले के साथ खेल रहा था और हारने वाला पक्ष हारने वाले के साथ। चूँकि मेरी जीत हुई थी, इसलिए मैं आगे बढ़ा; पर ज्यों-ज्यों खेल के दाँव-पेंच हाथ से निकलते महसूस हुए, मेरा सारा बदन आग जैसा जल उठा और ये लो, अंततः मैं हार भी गया! ऊपर से जीतने वाले का आकर हाथ मिलाना मुझे ऐसा लगा मानो—एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा! मन में आया कि यदि यह कुश्ती होती, तो इसे पटक-पटक कर मारता।
मैं ऐसा सोच ही रहा था कि सहसा मेरी नज़र आस-पास गई। वहाँ सात-आठ मेजों पर पक्ष-विपक्ष बैठे शतरंज के मिज़ाज में डूबे हुए थे। उन सबके शरीर में कुछ अजीब सी हलचल हो रही थी, मानो वे काँप रहे हों या भीतर से कुछ तड़प उठ रही हो। तभी अचानक मेरा ध्यान 'तादात्म्य' के विषय पर गया। अरे! हाल ही में तो पढ़ा था कि हमारे सुख-दुख का अस्तित्व इसी तादात्म्य (अत्यधिक जुड़ाव) के कारण ही है।
यह बात समझ में आते ही मैं भीतर से खिल उठा और मन इतना हल्का हो गया कि उसके बाद मैं दो-चार और शतरंज की बाज़ियाँ ख़ुशी-ख़ुशी हार गया; क्योंकि जिस आनंद और रस के लिए खेल खेला जाता है, वह तो मुझे हार-जीत से परे ही मिल गया था। हम इंसान भी कितने अजीब हैं, उस क्षण सब कुछ अपना मानकर खेल में डूब जाते हैं और फिर सुख-दुख, मान-अपमान तथा सर्दी-गर्मी के थपेड़े खाते हैं; जबकि हम और हमारा वास्तविक उद्देश्य तो इन सब चीज़ों से बहुत अतीत (परे) हैं।
तुम्हारा सखा,
ईशांत त्रिपाठी
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

