क़लम का सूर्य - कविता - जयदेव नारायण दास

क़लम का सूर्य - कविता - जयदेव नारायण दास | Hindi Kavita - Qalam Ka Surya - Jaydev Narayan Das
अज्ञान के घने कुहासे को,
जो पल में दूर भगाता है।
वो स्याही की हर एक बूँद से,
नव भोर का गीत सुनाता है।

​न झुका कभी जो सत्ताओं से,
न भय से कभी जो कंपित है,
वो शब्दों की तीखी रश्मि से,
अन्याय के सीने पर अंकित है।

​यह मूक नहीं, यह गर्जन है,
क्रांति का शंख बजाता है।
जो सोई हुई जन-चेतना को,
फिर से पल में जगाता है।

​तोड़ कुप्रथा की कड़ियाँ,
जो समता का संदेश दे।
अंबेडकर के उस न्याय-स्वप्न को,
जो जन-जन के परिवेश दे।

​कर्पूरी के उस त्याग-सत्य का,
दर्पण यह बन जाती है।
वंचित, शोषित के अधिकारों की,
यह हुँकार सुनाती है।

​राष्ट्र-धर्म ही प्रथम धर्म हो,
ऐसा पथ दिखलाता है।
भेदभाव की ढहा दीवारें,
एक अखंड देश बनाता है।

​वैभव की कोई चाह नहीं,
बस सत्य का पथ दिखलाता है।
इतिहास के काले पन्नों पर,
यह 'क़लम का सूर्य' चमकता है।

जयदेव नारायण दास - बेलहर, बांका (बिहार)

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