अनमोल - बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
अधूरी नज़्म - नज़्म - अनमोल
बुधवार, सितंबर 30, 2026
कल से एक अधूरी नज़्म लिखे बैठा हूँ
बात है इसमें कुछ मेरी और कुछ तुम्हारी
अपनी सारी बातें मैंने लिख रखी हैं
कैसे काटी मैंने बिन तेरे सब रातें
किनसे करता था मैं अक्सर तन्हा बातें
कैसे सूनी दीवारों को तकता था मैं
मन ही मन फिर जाने क्या-क्या बकता था मैं
इस जुदाई में मुझपर क्या-क्या बीता है
सच कहूँ तो एक-एक पल भारी बीता है
तेरे सपने, तेरी चाहत, उफ़ ये मोहब्बत, उफ़ ये आफ़त
कैसे जैसे-तैसे मैंने ये दिन काटे
इसके बाद की लाइनें मैंने छोड़ रखी हैं
आओ आकर इस नज़्म को अब मुक्कमल कर दो।
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