अंतिम परीक्षा - कविता - साई अनमोल

अंतिम परीक्षा - कविता - साई अनमोल | Hindi Kavita - Antim Pariksha - Sai Anmol
जुटी सभा बैठी है मौन
ताँक रही यह अबला कौन?
सूरज-चार बुझे बैठे 
देखे ये कौन, जो हैं देखें,
विद्वान-मुनि पद पर आसीन 
सीमाओं में भी बंधते अवतीर्ण!

तेज़ भरा इनका यह मुख
हे जने नाथ! सह-सहकर दुख
पहचानों आज क्यों फेरों मुख
रघुनाथ तुम्हारे ही ये सुत!
मैं करूँ तो क्या अब तुम्हीं कहो 
जो तनिक तुम्हें विश्वास तो हो
अरे करुण भरी हे माताओं! 
जरा तुम्हीं इन्हें अब समझाओ 
क्या नहीं जानते ये मुझको?
क्या नहीं जानते हैं सच को?
हे बन्धु-भ्रात तुम बोलो ना
इस चुप्पी को अब खोलो ना!

वही आज फिर से रोना यह
वही आज मुझको सहना यह,
तो भी मैं आज सब सह लूँगी 
रघु-कीर्ति को ना ढहने दूँगी;
पर यह परीक्षा लाते हैं 
अपना ही अंश ठुकराते हैं 
विद्वान-मुनि यहाँ बैठे ज्येष्ठ 
क्या यही धर्म? ये ही है श्रेष्ठ?

सुन रही थी सब सभा वीरानी
अबला की वो करुण कहानी 
रग-रग में अनुगूँज भरी थी
चीर कलेजा गूँज रही थी 
बस आँसू ही वो बहा रहे 
वो भी कुछ ना कर पा रहे!

वर्षों तक वन में रह-रहकर 
काँटे-कंकड़ सब सह-सहकर 
मैंने इनका ही साथ दिया 
नियति ने भी आघात किया 
तब भी वचनों पर टिकी रही 
सारे बंधन में बंधी रही
उपहार में मुझको मिला यह
दामन दाग़ों से भरा यह
तब भी ज्वाला में जली मैं 
भीतर ज्वाला में पली मैं 
पर हाय! विमल न हो पाई
फिर वही-शूल सेजें पाई।

हाय मैं अबला हार गई
साखी दे देकर हार गई!
यदि धर्मवती मैं, हूँ अमल
तो फट जाए यह धरती-तल 
ज्वालाओं-सा यह मेरा संसार 
मुझ दुखिया की सुन ले पुकार!

सभा हाल गई पूरी ही
मानो हिली पड़ी हो धूरी ही,
अम्बर में बिजली टूट पड़ी 
नीचे भूमि ही फूट पड़ी, 
धरती से जननी निकल आई
सब मुख पर अचरजता छाई!

धन्य-धन्य हे माँ-दर्शन
करूँ चरण मैं तेरे स्पर्शन!
मेरी पुकार तूने सुन ली
इस अभागिन की तूने सुध ली;
अब यहाँ नहीं कुछ भी मेरा 
श्वासें ये काँटों का घेरा
अब संग मुझे अपने ले चल
जलता है यहाँ एक-एक पल!

क्यों अबला ही नारी होती?
क्यों आजीवन बस है रोती?
क्यों सुख अपने सब खो देती?
क्यों सब के हक़ के दुख ढोती?
जिन चरणों को पूजा मैंने 
भगवान जिन्हें माना मैंने,
वही आज अनजान बने हैं 
दोष मुझी पे तान रहे हैं 
क्या आदि-अंत मेरी भूलें?
क्या सभी समर्पण हुए धूलें?
यदि मुझमें ही हो दोष सभी
तो रुक जाए यह श्वाँस अभी
मैं शब्द एक भी ना कहूँगी
पर और परीक्षा ना दूँगी!

थक गई है अब नारी यह
मत झूठ कहो अवतारी यह
कब तक ख़ुद को ही बतलाए 
कब तक आँसू पीती जाए?
हे माँ अब तू देर ना कर
तू ले जा मुझको दूर किधर, 
निज आँचल में बिठा ले तू
ममता में मुझे सुला ले तू!

ओ मेरी कोमल-फूल सुता 
तू अबला, बेबस, तू पतिता!
तू बड़ी जली है जीवन भर
मिला ना सुख भी रंचक पर,
अब आ जा इन बाहों में तू
अब आ जा इन आहों में तू,
तुझे यहाँ न अब रहने दूँगी
निज आँचल में ही राक्खूँगी!

जननी ने उसे बिठाकर के
छाती से उसे लगाकर के,
धरती में होने विलीन चलीं
ले तड़पी-सी एक मीन चलीं
मर्यादोत्तम तभी बिलख पड़े 
सब भौचक्के से झलक पड़े,
कर सिद्ध गई पावनता-पुण्य 
अब शेष था केवल सबका शून्य!


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