नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? - कविता - अमृता वर्मा

नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? - कविता - अमृता वर्मा | Hindi Kavita - Nari Tum Chup Kyun Rahti Ho - Amrita Verma. नारी पर कविता
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?
मन में इतना दर्द छुपाए,
औरों पर एहसान जताए,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

ख़ून पिलाकर जिसको पाला,
वहीं नर्क की आग में डाला,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

जब मन में ज्वाला जलते
आँखों में आँसू पलते,
फिर क्यों होंठ सील जाते हैं,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

जपती जाती हो चुपचाप
हर दिन सहनशीलता का जाप,
ताकत हो तुम, फिर भी क्यों,
सह जाती हो हर संताप,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

घर की लक्ष्मी, मंदिर की ज्योति,
फिर भी क्यों रहती ख़ामोश,
हर रिश्ते में सब कुछ खोकर
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

निशा में आशा की दीप जलाकर,
हृदय में स्वर्णिम फूल खिलाकर
स्वप्न सजाकर खोकर सारे
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

जीवन के हर सुख में, दुख में,
कभी उजाला, कभी गहन तम में,
खाकर चोट सभी रिश्तों में,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

कंज कली-सा तेरा उर है,
करुण प्रेम जैसे जलधर है,
संघर्ष तो तेरा जीवन भर है,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

तुम्हारी मन की व्यथा जो सारी,
वह जीवन से बनी बेचारी,
कष्ट भरे सब जीवन में,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

कर्तव्य सदा तेरे सम्मुख,
मधुर वाणी व प्रेम की भूख
त्याग की कभी मूर्ति सदा ही,
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो?

अमृता वर्मा - बलिया (उत्तर प्रदेश)

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