डॉ॰ विकास मोहन गुप्ता - लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
अब हो प्रयाण - कविता - डॉ॰ विकास मोहन गुप्ता
मंगलवार, सितंबर 29, 2026
अब हो प्रयाण
मृत्यु अंत नहीं,
है अवसर
होता देहान्तर
है क्षण भर
मात्र साधन
निर्जीव काया
जन्म की
प्रेरक है माया
करती योनि
योनि धारण
आत्मा वशी
सदोष तत्क्षण
जन्मता पुनः
सजीव शरीर
ध्येय बस भव
सागर के तीर
किन्तु मार्ग का
अवरोधी अज्ञान
अलग हों कैसे
दोष प्रधान
आह! कैसा
विचित्र संयोग
दुःख मिला
सकल सुख भोग
तृष्णा
शिखी-सम होती अतिरेक
मन
चंचल गति करता अतिवेग
मनोजव
नही मैं कोई योगी
हाँ
स्वीकार किया मैं भोगी
प्रकल्पित
सकल सृष्टि अवसान
सत्य है
परम् मुक्ति- निर्वाण
किंतु मैं
माया का हूँ दास
शेष है
अभी प्रणय की रास
स्वयंभू
काल अनादि अनन्त
वशी हैं
भोगी योगी सन्त
अनिश्चित
आयु जीवन मे शेष
सतत
चलता व्यापार विशेष
कर्मफल
पुनः भोगने प्राण
मुक्त
अब हो प्रयाण
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