संदेश
अविरत बढ़ना सत्य पथ - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
बीती आज विभावरी, हुआ सबेरा आज। पौरुष दुनियाँ जागता, इष्ट सुपथ आग़ाज़।। अविरत बढ़ना सत्य पथ, हो आलस तम नाश। उद्योगी अरुणिम किरण, विजय ज…
बेटियाँ - कविता - प्रमोद कुमार
छनन-छनन छुम सुनते ही दिल ख़ुश हो जाता है। देख सुखद भविष्य के सपने मन कहीं खो जाता है। सोन चिरईं-सा घर-आँगन बीच ठुमक-मटक जब चलती हैं– ख़ू…
कैसे तुम्हें बुलाता भला? - कविता - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
शब्द तुम, छन्द तुम, गीत और राग तुम बेसुध-सा आलाप ले-ले मैं तुम्हें गाता रहा कभी तो समझोगी मेरे निर्मल मनोभावों को बस अपने मन को यही मै…
Boutique Business को Digital कैसे बनाएँ? Boutique Management Software से आसान होगा पूरा काम।
भारत में boutique और tailoring का कारोबार लंबे समय से creativity, personal service और customer relationships पर चलता आया है। एक अच्छी…
स्वार्थ - कहानी - डॉ॰ धनंजय कुमार मिश्र
मिहिजाम एक अजीब क़स्बा था। न पूरी तरह शहर, न पूरा गाँव। सुबह मंदिरों की घंटियों से खुलती, दोपहर में चित्तरंजन की फैक्ट्री संस्कृति का …
अंकुरण फिर लौट आए - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे अश्रु दल जब, अंजुरी को भेद पाए। अंकुरण फिर लौट आए। हो गया आँगन सहर्षित, आश्रुओं ने जीत देखी। पल्लवों के स्वप्न जागे, …
वज़ीर - घनाक्षरी छंद - महेश कुमार हरियाणवी
हार का ना डर कोई जीत का ना वादा है, दुनिया ही अपनी है अपना इरादा है। हाथ वही काँपते हैं डर की लहर पे, जिनको यकीन घर उनका बुरादा है। सा…
तुम्हें क्या कहा जाय? - लघुकथा - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
दीपू को लेकर स्कूल के लिए निकल ही रहा था कि पत्नी ने कहा— ‘दो-तीन रोटियाँ बची हैं रात की, लेते जाईए, रास्ते में गाय या कुत्ता मिले तो …
फिर भी - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
बहुत भीड़ है, फिर भी तपिश अकेलेपन की। दूर आकाश में, और निर्जन वन में, कोई वैमनस्यों को लेकर, साधक, अपने को साधने चला। वहाँ विवादों की …
भ्रम - कविता - मदन लाल राज
प्याज छीलने वाले को संदेह था कि– छिलके के नीचे छिलका होगा। और प्याज को ये भ्रम है कि– छिलका परत दर परत होगा। एक छीलता है तो दूसरा छिलत…
बच्चों के बिन घर सूना है - गीत - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'
बच्चों के बिन घर सूना है बच्चे दूध बतासा। घुल जाते हैं अन्तर्मन में भर जाते हैं आशा। उनसे ही जीवन की डोरी वह भविष्य की अभिलाषा। प्रगति…
हे मेरे नन्हें दीपक - कविता - साई अनमोल
हे मेरे नन्हें दीपक तुझे जलना बारम्बार! तम में यह जीवन पला है पलकों पर आँसू गला है, इस पुतली की वर्ती से ही तुझको करना प्यार! तुझे जलन…
प्रेम दया विश्वास से, विजयी हो संसार - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
प्रेम दया विश्वास से, सुंदर घर निर्माण। कटु वाणी से टूटकर, बिखरे ख़ुशियाँ प्राण॥ बचपन की मुस्कान से, महके गली सुहात। मिल-जुल कर जब लोग …
शिक्षा का उपवन - कविता - जयराम यादव
चलो चलें हम अपनी कक्षा, जहाँ चहकते बच्चे प्यारे, शिक्षा का उजियारा फैला, चमके जैसे चाँद-सितारे। चलो चलें हम अपनी कक्षा... मर्यादा में …
ज़िंदगीनामा - कविता - अमृत 'शिवोहम्'
ज़िंदगी क्या है? दिए की लौ का जलना? या तेज़ हवा में लौ का डगमगाना? या डगमगाती लौ को हथेलियों से बचाना? या बचाते-बचाते हथेलियों का जल ज…
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