संदेश
हमारे मीत - गीत - सुशील कुमार
आशा, पीड़ा, प्रेम, विरह जब, काग़ज़ पर नव रूप सँवारे। छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे। जब भी जीवन थका अकेला, भावों ने …
वो - कविता - सुनीता प्रशांत
चाहती है वो कभी देर से उठना चाहती है कभी ना जलाऊ चूल्हा न ही जाऊँ पनघट पर भरा घट उठाने चाहती है वो उतारना सारा बोझ जो उसके तन पर नहीं …
क्यों? - कविता - रिंकी
क्यों भी कितना अजीब शब्द है, जो ख़ामोशी में भी शोर मचा देता है। इंसान को अपने ही ख़्यालों से लड़ने पर मजबूर कर देता है, जवाब ढूँढ़ने की आ…
मैं कौन हूॅं? - कविता - जितेन्द्र सिंह राणावत
मैं कौन हूॅं? अनंत शून्यता का एक निभृत आलाप हूॅं। या किसी संतप्त हृदय का मौन विलाप हूॅं।। मैं कौन हूॅं? विरहिणी के नयनों में अटका अश्र…
घोर अंधड़ - कविता - प्रवीन 'पथिक'
हर दिन एक नया सबेरा लिए आता है। पर बात; वही पुरानी होती है। मन में घोर अंधड़, पुरानी स्मृतियाँ, वही विचार एक साथ कौंधता है हृदय में जीव…
माता वर दो हमें - गीत - विशेष शर्मा
माता वर दो हमें, माता वर दो हमें, शब्द संसार का कुछ हुनर दो हमें। बंद – 1 ज्ञान का दीप ऐसा जलाते रहें, जग को अज्ञान से हम बचाते रहें। …
शास्त्रों से शृंगार करो - कविता - श्रेया तिवारी
न केवल आभूषण से ही, वरन शस्त्रों का शृंगार करो, चक्र सुदर्शन, वज्र, त्रिशूल और तलवारों से अलंकार करो। बात करें जो न्याय विरुद्ध, तुम उ…
दीप का अंतिम स्वप्न - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव
सूर्य डूबा, साँझ ने जब रात का आँचल ओढ़ लिया, एक अकेला दीप तब भी अँधियारे से जोड़ लिया। बोला— "मुझमें कहाँ सामर्थ्य इतनी, जो तम का…
पाप, पुण्य और पगडण्डी - कविता - श्वेता चौहान 'समेकन'
मैं नहीं जानती, पुण्य क्या होता है…? मैं नहीं जानती…! पाप की सटीक परिभाषा…! किसी के लिए… प्रेम पुण्य है, तो किसी के लिए…! घृणित पाप…! …
चौराहे पर बिखरा हुआ प्रेम - कहानी - डॉ॰ धनंजय कुमार मिश्र
शहर का वह चौराहा बड़ा बदनाम था। दिन में वहाँ इतनी भीड़ रहती कि आदमी आदमी को पहचान न सके और रात में इतनी ख़ामोशी उतर आती कि किसी अकेले आ…
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