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अनोखी हलचल - डायरी लेखन - ईशांत त्रिपाठी
०८ सितंबर २०२६ (वाराणसी) मंगलवार भोलूराम जी, थकान हो जाती है कभी-कभी अध्यात्म की किताबें पढ़कर और वैसी बातें सुनकर। पर भगवान भी निराल…
कभी हम पे चलता था सिक्का तुम्हारा - ग़ज़ल - सोनू यादव
अरकान : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन तक़ती : 122 122 122 122 कभी हम पे चलता था सिक्का तुम्हारा मगर अब नहीं है वो रुतबा तुम्हारा तिरे…
मगध का महान सम्राट - कविता - स्वीटी कुमारी सिन्हा
क्रूर नृप घनानंद के क्रूरता से, मगध का सिंहासन डगमगाया था। चीख़ती चिल्लाती प्रजा के मन में, मौर्यवंश ने एक उम्मीद जगाया था। गुरु चाणक्य…
आख़िरी पन्ना - कहानी - सादिक़
शाम का धुँधलका धीरे-धीरे शहर की गलियों पर उतर रहा था। आसमान पर फैले बादलों के बीच सूरज की अंतिम किरणें किसी थके हुए मुसाफ़िर की तरह वि…
अंतिम विदाई - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब दी हमें अंतिम विदाई जब तुम्हारे नेत्र से प्रिये, अश्रु की वो धार आई। प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब, दी हमे…
अपने आप से घबरा गया हूँ - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
अपने आप से घबरा गया हूँ, छाया से धूप में आ गया हूँ। मेरे अपने से कुछ सवाल थे, जैसे अँधेरे में मशाल थे। दूजों से बच चलता रहा, बस अपनों …
गहरा सन्नाटा - कविता - प्रवीन 'पथिक'
कभी कोई रात इतनी उदास होती है जैसे ग़म के सागर में डूबी अन्यमनस्क, अपलक, अतीत में ढूॅंढ रही हो कुछ! जिसका चित्र मानस में सजीव होता है। …
सब चींटी है - कविता - बिंदेश कुमार झा
मेरे पैरों के नीचे एक छोटी-सी सुरंग थी, जहाँ चींटियों की फ़ौज में ग़ज़ब की उमंग थी। किसी के हाथ में फूल था, तो किसी के हाथ में मिठाई, क…
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति - २ - संस्कृत काव्य - बाल कृष्ण मिश्रा
जगज्जननी आदि शक्ति, आदि रूप धारिणी, महाकाली महालक्ष्मी, महासरस्वती रूपिणी। शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा कल्याणी, कूष्माण्डा स्क…
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति - १ - संस्कृत काव्य - बाल कृष्ण मिश्रा
जयति महाशक्ति स्वरूपा, शिव-हृदय-विहारिणी, प्रलय-काल-नृत्यातुरा, दनुज-वंश-विदारिणी। डमरू-ध्वनि-संग थिरकती, चरण-चाप-कंपित-धरा, त्रिलोकी-…
अविरत बढ़ना सत्य पथ - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
बीती आज विभावरी, हुआ सबेरा आज। पौरुष दुनियाँ जागता, इष्ट सुपथ आग़ाज़।। अविरत बढ़ना सत्य पथ, हो आलस तम नाश। उद्योगी अरुणिम किरण, विजय ज…
बेटियाँ - कविता - प्रमोद कुमार
छनन-छनन छुम सुनते ही दिल ख़ुश हो जाता है। देख सुखद भविष्य के सपने मन कहीं खो जाता है। सोन चिरईं-सा घर-आँगन बीच ठुमक-मटक जब चलती हैं– ख़ू…
कैसे तुम्हें बुलाता भला? - कविता - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
शब्द तुम, छन्द तुम, गीत और राग तुम बेसुध-सा आलाप ले-ले मैं तुम्हें गाता रहा कभी तो समझोगी मेरे निर्मल मनोभावों को बस अपने मन को यही मै…
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