संदेश
हे हरिप्रिये नारायण की प्यारी - गीत - रजनीश तिवारी 'अनपढ़ माशूक़'
हे हरिप्रिये नारायण की प्यारी आ महालक्ष्मी सुन ले हमारी मुझे धन वैभव दे ख़ुशियाँ ये सारी द्वार तेरे दर पे है आया भिखारी हे हरिप्रिये ना…
तो समझो दिवाली है - कविता - ब्रजेश कुमार
जब हृदय से हृदय मिले और प्रेम का दीप जले, रिश्तों में माधुर्य घुले और अपनों से स्नेह मिले तो समझो, दिवाली है। जब उम्मीदें फिर से मुस्क…
प्रेम के रंग में - कविता - उमेश शुक्ला
प्रेम के रंग में, अब है हम रंग गए मिलके हर पल सुनहरा बनाएँगे हम। दर्द दुनिया से अब चाहे जितना मिले पर सदा प्रेम के गीत गाएँगे हम।। मैं…
भ्रम - गीत - प्रमोद कुमार
भ्रम हमेशा ही मन में यूँ पलता रहा, रफ़्ता-रफ़्ता ये जीवन भी चलता रहा। साथ रहते भी जो पास ना आ सके, उनकी यादों में बस मन मचलता रहा। उनके …
मुसाफ़िर - कविता - राहुलदेव गौतम
न जाने क्या कहती है मुसाफ़िरों से ट्रेन की आवाज़ ध्यान से सुनो तो लगता है कुछ पटरियों की तरह पीछे छूट जाते है बीते यादों के लम्हें मोम-…
दशहरे के मेले में - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
दशहरे के मेले में रावण को जलाने वाले लोग, नहीं जला पाते अपने भीतर के रावण को। जो कि देखते हैं हरेक स्त्री को गंदी निगाहों से, जो कि हड…
युवा : मनुष्यता का नया सवेरा - कविता - जयराम यादव
मानव अपनी मानवता की राह भूल जब जाता है, मर्यादा का पावन बंधन पल में ही बिखराता है। करुणा, दया, परमार्थ जब मौन खड़े रह जाते हैं, स्वार्…
शिक्षा - सजल - संजय राजभर 'समित'
शिक्षा की रोशनी में चमकदार बनेंगे। कच्चे घड़े हैं बच्चें असरदार बनेगें।। आधुनिक पकड़ बनें हम ऐसी व्यवस्था दें। प्रज्ञा की लौ जलाकर वजन…
साँसों के पंछी और मौन का मरहम - कहानी - डॉ॰ पीताम्बरी
रात के दो बज रहे थे। पूरा बेवर सन्नाटे की चादर ओढ़े सोया था, पर नियति के कमरे में हवा जैसे भारी हो गई थी। नियति गहरी नींद में थी, तभी …
माँ कालरात्रि देवी - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
शुभ दिन आए सप्तमी, कालरात्रि अवतार। भय-तम-खल-दलहारिणी, दे साहस उपहार॥ महाकाल भयकारिणी, माँ फल दे सन्तान। दुष्ट दलन कर भक्त को, देती शु…
नव दिन माँ नवरात्रि में आओ - गीत - रजनीश तिवारी 'अनपढ़ माशूक़'
नव दिन माँ नवरात्रि में आओ भक्तिभाव मेरे मन में जगाओ वात्सल्य और स्नेह बरसाओ करुणामयी माँ दया दिखाओ ममता का आँचल फैलाओ हे नवदुर्गा दरश…
स्मृतियाँ भी ले जाओ - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव
रजनी की निस्तब्धता में, जब जग सारा सो जाता है, चंद्र अकेला नभ में बैठा, मेरा दुःख दोहराता है। पलकें मूँदूँ तो तुम दिखतीं, खोलूँ तो अँध…
मौन - कहानी - डॉ॰ धनंजय कुमार मिश्र
सन् 1987 - 88 रहा होगा। दक्षिण बिहार का वह छोटा-सा क़स्बा अब भी क़स्बा कम और जंगल की देह पर उगा हुआ एक विरल-सा गाँव अधिक था। दूर तक फैली…
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