संदेश
क़लम का सूर्य - कविता - जयदेव नारायण दास
अज्ञान के घने कुहासे को, जो पल में दूर भगाता है। वो स्याही की हर एक बूँद से, नव भोर का गीत सुनाता है। न झुका कभी जो सत्ताओं से, न भय …
आसमानी धरातल - कविता - मीनाक्षी पँवार
आसमाँ के पास भी है अपना धरातल, जहाँ पर उछलते-थिरकते हैं बादल, जहाँ डगमगाते हैं पंछी पवन में, तड़ित के तरुवर हैं झूले गगन में, जहाँ जन्…
अधूरी नज़्म - नज़्म - अनमोल
कल से एक अधूरी नज़्म लिखे बैठा हूँ बात है इसमें कुछ मेरी और कुछ तुम्हारी अपनी सारी बातें मैंने लिख रखी हैं कैसे काटी मैंने बिन तेरे सब…
अब हो प्रयाण - कविता - डॉ॰ विकास मोहन गुप्ता
अब हो प्रयाण मृत्यु अंत नहीं, है अवसर होता देहान्तर है क्षण भर मात्र साधन निर्जीव काया जन्म की प्रेरक है माया करती योनि योनि धारण आत्म…
बेटी आँगन में - कविता - सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
तेरे आने से महका ये आँगन, खिल उठीं फ़िज़ाएँ। तेरे बिना सब था सूना-सूना, तू मुस्कराए, बादल भी खिल जाएँ। इस आँगन में तेरे क़दम जैसे लक्ष्…
अनोखी हलचल - डायरी लेखन - ईशांत त्रिपाठी
०८ सितंबर २०२६ (वाराणसी) मंगलवार भोलूराम जी, थकान हो जाती है कभी-कभी अध्यात्म की किताबें पढ़कर और वैसी बातें सुनकर। पर भगवान भी निराल…
कभी हम पे चलता था सिक्का तुम्हारा - ग़ज़ल - सोनू यादव
अरकान : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन तक़ती : 122 122 122 122 कभी हम पे चलता था सिक्का तुम्हारा मगर अब नहीं है वो रुतबा तुम्हारा तिरे…
मगध का महान सम्राट - कविता - स्वीटी कुमारी सिन्हा
क्रूर नृप घनानंद के क्रूरता से, मगध का सिंहासन डगमगाया था। चीख़ती चिल्लाती प्रजा के मन में, मौर्यवंश ने एक उम्मीद जगाया था। गुरु चाणक्य…
आख़िरी पन्ना - कहानी - सादिक़
शाम का धुँधलका धीरे-धीरे शहर की गलियों पर उतर रहा था। आसमान पर फैले बादलों के बीच सूरज की अंतिम किरणें किसी थके हुए मुसाफ़िर की तरह वि…
अंतिम विदाई - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब दी हमें अंतिम विदाई जब तुम्हारे नेत्र से प्रिये, अश्रु की वो धार आई। प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब, दी हमे…
अपने आप से घबरा गया हूँ - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
अपने आप से घबरा गया हूँ, छाया से धूप में आ गया हूँ। मेरे अपने से कुछ सवाल थे, जैसे अँधेरे में मशाल थे। दूजों से बच चलता रहा, बस अपनों …
गहरा सन्नाटा - कविता - प्रवीन 'पथिक'
कभी कोई रात इतनी उदास होती है जैसे ग़म के सागर में डूबी अन्यमनस्क, अपलक, अतीत में ढूॅंढ रही हो कुछ! जिसका चित्र मानस में सजीव होता है। …
सब चींटी है - कविता - बिंदेश कुमार झा
मेरे पैरों के नीचे एक छोटी-सी सुरंग थी, जहाँ चींटियों की फ़ौज में ग़ज़ब की उमंग थी। किसी के हाथ में फूल था, तो किसी के हाथ में मिठाई, क…
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति - २ - संस्कृत काव्य - बाल कृष्ण मिश्रा
जगज्जननी आदि शक्ति, आदि रूप धारिणी, महाकाली महालक्ष्मी, महासरस्वती रूपिणी। शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा कल्याणी, कूष्माण्डा स्क…
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