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दिवाली विशेष रचनाएँ: कविता, गीत, दोहे और मुक्तक का सुंदर संकलन | Diwali Poetry
दीपावली केवल दीपों का पर्व नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का उत्सव है। यह पर्व हमें भीतर और बाहर के अंधेरों को दूर कर प्रेम,…
सोच युवाओं की - कविता - जयराम यादव
नई सोच है, नई डगर है, आँखों में कुछ सपने हैं, अपनी धुन में चलने वाले, मन में अरमान अपने हैं। परंपरा को साथ लिए वे, नित नया सवेरा गढ़ते…
भोर से साँझ तक - कविता - मीनाक्षी पँवार
उगता है सूरज या उगती है भोर, चढ़ता है सूरज या चढ़ता है शोर। बिंदु-सा दिखता पर रहता चहुँ ओर, फैलाकर रंगों को करदे विभोर। चहके हैं पंछी …
हमारे मीत - गीत - सुशील कुमार
आशा, पीड़ा, प्रेम, विरह जब, काग़ज़ पर नव रूप सँवारे। छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे। जब भी जीवन थका अकेला, भावों ने …
वो - कविता - सुनीता प्रशांत
चाहती है वो कभी देर से उठना चाहती है कभी ना जलाऊ चूल्हा न ही जाऊँ पनघट पर भरा घट उठाने चाहती है वो उतारना सारा बोझ जो उसके तन पर नहीं …
क्यों? - कविता - रिंकी
क्यों भी कितना अजीब शब्द है, जो ख़ामोशी में भी शोर मचा देता है। इंसान को अपने ही ख़्यालों से लड़ने पर मजबूर कर देता है, जवाब ढूँढ़ने की आ…
मैं कौन हूॅं? - कविता - जितेन्द्र सिंह राणावत
मैं कौन हूॅं? अनंत शून्यता का एक निभृत आलाप हूॅं। या किसी संतप्त हृदय का मौन विलाप हूॅं।। मैं कौन हूॅं? विरहिणी के नयनों में अटका अश्र…
घोर अंधड़ - कविता - प्रवीन 'पथिक'
हर दिन एक नया सबेरा लिए आता है। पर बात; वही पुरानी होती है। मन में घोर अंधड़, पुरानी स्मृतियाँ, वही विचार एक साथ कौंधता है हृदय में जीव…
माता वर दो हमें - गीत - विशेष शर्मा
माता वर दो हमें, माता वर दो हमें, शब्द संसार का कुछ हुनर दो हमें। बंद – 1 ज्ञान का दीप ऐसा जलाते रहें, जग को अज्ञान से हम बचाते रहें। …
शास्त्रों से शृंगार करो - कविता - श्रेया तिवारी
न केवल आभूषण से ही, वरन शस्त्रों का शृंगार करो, चक्र सुदर्शन, वज्र, त्रिशूल और तलवारों से अलंकार करो। बात करें जो न्याय विरुद्ध, तुम उ…
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