संदेश
टूटे पंख - कविता - नंदनी खरे 'प्रियतमा'
एक चिरैया थी बाग़ों में, अभी तो उड़ना सीख रही थी। अपने कोमल कोमल स्वर में, अभी कुहुकना सीख रही थी। उड़ने को कोशिश में चिड़िया, सारा दिन…
मातृभाषा - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मातृभाषा होती है माँ की तरह स्नेह देने वाली। जब जाता है इंसान किसी दूर-दराज़ इलाके में नौकरी की तलाश में, तो वहाँ की भाषा वहाँ के लोग …
घावों का महागीत - कविता - गोलेन्द्र पटेल
तेरी स्मृतियों के धुँधले आँगन में मैं आज भी एक बुझते हुए दीपक की तरह टिमटिमाता हूँ मेरी उँगलियों में अब रंग नहीं बचे फिर भी मैं टूटे ह…
अश्रु सर्वथा जीते होंगे - कविता - राघवेंद्र सिंह
अश्रु सर्वथा जीते होंगे, उत्कंठित स्वर हारा होगा। प्रणत दृष्टि से जब भी हे प्रिय! तुमने हमें निहारा होगा। अश्रु सर्वथा जीते होंगे, उत्…
तुम भोगी अश्रु के - कविता - साई अनमोल
धूलि में अम्बर कल्पित कण में काया का मोल, भिक्षुक से इस जीवन में अश्रु अपने अनमोल! इनमें जीवन प्रतिबिम्बित इनसे क्यों खेलो खेल? खारेपन…
चौखम्बा - कविता - मोहित नेगी 'मुंतज़िर'
वे तब निकलती हैं घास के लिए जंगलों को, जब उन्हें दिखने लगती है चौखम्बा के शिखरों पर सुनहरी रौशनी। वे करती रहती हैं काम और निहारती रहत…
मेरे और तुम्हारे सपनें - ग़ज़ल - ममता शर्मा 'अंचल'
मेरे और तुम्हारे सपनें, कितने प्यारे-प्यारे सपनें। हम दोनों ने रंग भरे हैं, अजब अनोखे न्यारे सपनें। इन पलकों पर ही सोते हैं, आँखों के …
प्रेम की पगडंडी - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'जानिब'
चलो आज फिर एक पगडंडी चुनें, जहाँ पाँव से पहले दिल चल पड़ें। जहाँ शब्द ना हों, बस नयन बोलते, और चुप्पी में भी भाव छलक पड़ें। छाँव जैसे …
आदमी झुकता वहीं है - कविता - प्रवीन 'पथिक'
आदतन आदमी झुकता वहीं हैं, जहाॅं उसने समय व्यतीत किया हो। समय, जो निरंतर आगे बढ़ता जाता है। हम बीते लम्हों में रुक जाते हैं। चाहते हैं,…
क्यूँ मुझे फूल पसंद हैं? - कविता - गुल
राहों से गुज़रते हुए किनारों पर चलते हुए यूँही तुम अचानक से रुक जाती हो देखती हो जब किसी खिलती हुई कली को क्या तुम्हें फूल पसंद है…
यदि सहिष्णुता नहीं आपमें - मुक्तक - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'
यदि सहिष्णुता नहीं आपमें आह! कमी यह भारी। प्रभु की दया कृपा से ही तो यह चलती जगती सारी। यह भ्रम कैसे, गर्व कहाँ से अवगुण बड़ा 'अंश…
मन की गाँठ - कविता - मोहम्मद रब्बानी
दो दोस्त आमने सामने खड़े थे, कुछ मन मोटाव भी है। वे एक-दूसरे को देख रहे, आपस में। बोलने की चाह में, मन ही मन, पहले वो... नहीं, पहले वो…
तुम्हारे इशारे - गीत - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
तुम्हारे इशारों में छुपी कोई कहानी है, नज़रों की ज़ुबाँ भी कितनी सुहानी है। लब कुछ न कहें, दिल सब बयाँ करता, ये इश्क़ भी कितनी अजब रवान…
बहू का घूँघट - कहानी - डॉ॰ पीताम्बरी
कार की पीछे वाली सीट पर घूँघट डाले, सर झुकाए बैठी अमिता सिसकियाँ ले रही थी। पिता के घर से विदा हुए उसे घंटे भर से ज़्यादा हो चुका था, ल…
कोरी कल्पना -कविता - अतुल पाठक
कोरी-सी एक कल्पना थी, मन ने जिसे सँजोया था। न कोई रूप, न कोई रंग, बस एहसासों में पिरोया था। आँखों में हल्की-सी चमक, सपनों ने रंग भर दि…
सुना है गाँव में - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
सुना है गाँव में, सुबह के समय, कोयल अब भी कूकती है, टिटहरी सुर मिलाती है, गिनी चुनी चिड़ियाँ, चहचहाती हैं। और सुबह के मौन को तोड़, कह…
रे पागल मन, ठहर जा तू! - कविता - साई अनमोल
मेरे पागल मन! तू पागल मन! ठहर जा तू! ठहर जा तू! क्यों है चाह तेरी नव-जुड़ना? क्यों है चाह तेरी अब मुड़ना? रे क्यों अब भटक रहा तू! ठहर …
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