संदेश
एक और अर्थ - कविता - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
कभी-कभी एक स्मृति अपना चेहरा उतारकर हमारी तरफ़ रख देती है, और हम समझते हैं ये हम हैं। पर वो हम नहीं— हमारी सम्भावना होती है, जो किस…
ओ प्यारे मेरे! आँखें खोल! - कविता - साई अनमोल
मैं दीपक तो तुम लौ बन जाना पवमान चतुर तुमको ले लेगी? ना.. ना.. तुम मुझमें ही समाना; अरे प्यारे अब तो जाग ज़रा! दृष्टि कुछ मुझपे डाल ज़रा…
आदमी टूट जाता है - कविता - प्रवीन 'पथिक'
बहुत कुछ टूट जाता है, छूट जाता है; जब आदमी ख़ुद से रूठ जाता है। एक खालीपन से, उसका जीवन भर जाता है। जब वह खो जाता है, किसी का हो जाता …
मन को केन्द्रित करो लक्ष्य में - मुक्तक - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'
मन को केन्द्रित करो लक्ष्य में पथ स्वमेव मिल जाएगा। एकाहारी प्रभु का चिन्तन मार्ग तुम्हें दिखलाएगा। सोते जगते बैठ प्रसाधन खाते पीते प्…
स्वाभिमान की अग्निपरीक्षा - कहानी - डॉ॰ पीताम्बरी
कॉलेज के स्टाफ रूम की वह दोपहर कुछ अलग थी। खिड़की से छनकर आती धूप वैदेही की मेज पर बिखरी कॉपियों पर सुनहरी लकीरें खींच रही थी। चारों ओ…
हनुमत अमृतवाणी - गीत - महेश कुमार हरियाणवी
जय राम भक्त हनुमान जी, जय सेवक लखन महान की। जय ज्ञान के दीप ईमान की, महाबली वीर हनुमान की॥ अमर अजर अचरज है माया, वज्र कठोर सशक्त है का…
अवगुण सदा रहे हैं - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
अवगुण सदा रहे हैं, निश्चय भी सदा रहा। लाख बार गिर जाऊँ, फिर उठना है, मन में यह सदा रहा है, निश्चय भी सदा रहा है। भावुक थे निर्णय मस्ति…
प्रकृति से सीख - कविता - उमेन्द्र निराला
नदियाँ बहती हैं, निरंतर बहती हैं। चट्टानों को भी काटकर, मंज़िल पाने को बहती हैं। पर्वत खड़े हैं, सदियों से खड़े हैं। सब कुछ सहकर भी अड…
अधर पर सँवारूँ तुझे - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'जानिब'
साँझ की तीर पर बैठकर निहारूँ तुझे, स्वप्न की ओट से मैं पुकारूँ तुझे। भाव मेरे सिमटते रहें मौन में, शब्द बनकर अधर पर सँवारूँ तुझे। नील …
है ऐ अपना बिहार हो भईया - गीत - डॉ॰ रवि भूषण सिन्हा
जहॉं की धरोहर में, है गया, नालन्दा, वैशाली। है ऐ अपना बिहार हो भईया, और हम हैं बिहारी। पूर्वजों की आत्मा को, जहॉं मोक्ष की होती प्राप्…
अमर निशानी - कविता - मयंक द्विवेदी
जब रण में असि ललकार लगाती है, जब बात स्वाभिमान की आती है, जब चंद्रहास के अट्टहास पर, दसों दिशाएँ सो जाती हैं, तब हाड़ी शीश थाल सजाती ह…
नए चित्रकार - कविता - बिंदेश कुमार झा
मकान में नए लोग आने लगे हैं, दीवार के दाग़ साफ़ होने लगे हैं। यह दाग़ नहीं है, चित्रकारी है, इसमें पेंसिल, चौक और किलकारी है। एक बड़े कल…
टूटे दिल की पीर हुई मैं - ग़ज़ल - ममता शर्मा 'अंचल'
अरकान : फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन तक़ती : 22 22 22 22 टूटे दिल की पीर हुई मैं, बिन राँझे की हीर हुई मैं। इश्क़ के गहरे तीर सहे हैं, द…
ज़िन्दगी ने सीखना मुझको सिखाया हार कर - ग़ज़ल - डॉ॰ नेहाल कुमार सिंह निर्मल
ज़िन्दगी ने सीखना मुझको सिखाया हार कर, ख़्वाब सारे टूट बैठे दिल के आँगन पार कर। जिनके दम से साँस चलती थी वही बेगाने हुए, अपनी ही परछाइ…
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