संदेश
प्रेम की पगडंडी - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'जानिब'
चलो आज फिर एक पगडंडी चुनें, जहाँ पाँव से पहले दिल चल पड़ें। जहाँ शब्द ना हों, बस नयन बोलते, और चुप्पी में भी भाव छलक पड़ें। छाँव जैसे …
आदमी झुकता वहीं है - कविता - प्रवीन 'पथिक'
आदतन आदमी झुकता वहीं हैं, जहाॅं उसने समय व्यतीत किया हो। समय, जो निरंतर आगे बढ़ता जाता है। हम बीते लम्हों में रुक जाते हैं। चाहते हैं,…
क्यूँ मुझे फूल पसंद हैं? - कविता - गुल
राहों से गुज़रते हुए किनारों पर चलते हुए यूँही तुम अचानक से रुक जाती हो देखती हो जब किसी खिलती हुई कली को क्या तुम्हें फूल पसंद है…
मन की गाँठ - कविता - मोहम्मद रब्बानी
दो दोस्त आमने सामने खड़े थे, कुछ मन मोटाव भी है। वे एक-दूसरे को देख रहे, आपस में। बोलने की चाह में, मन ही मन, पहले वो... नहीं, पहले वो…
कोरी कल्पना -कविता - अतुल पाठक
कोरी-सी एक कल्पना थी, मन ने जिसे सँजोया था। न कोई रूप, न कोई रंग, बस एहसासों में पिरोया था। आँखों में हल्की-सी चमक, सपनों ने रंग भर दि…
सुना है गाँव में - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
सुना है गाँव में, सुबह के समय, कोयल अब भी कूकती है, टिटहरी सुर मिलाती है, गिनी चुनी चिड़ियाँ, चहचहाती हैं। और सुबह के मौन को तोड़, कह…
रे पागल मन, ठहर जा तू! - कविता - साई अनमोल
मेरे पागल मन! तू पागल मन! ठहर जा तू! ठहर जा तू! क्यों है चाह तेरी नव-जुड़ना? क्यों है चाह तेरी अब मुड़ना? रे क्यों अब भटक रहा तू! ठहर …
स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित'
जेठ की दुपहरी में एक नव यौवना जिसके पीठ पर बंधा बच्चा है सिर पर ईंटे झुलसती हुई गर्म हवाएँ हैं, एक स्त्री कैसे झेल लेती है? ऊपर से घूर…
आत्मग्लानि - कविता - प्रवीन 'पथिक'
सोचता हूॅं, हार जाऊॅं उन लम्हों से, जिनसे लड़ते झगड़ते साल बीते। टूट कर बिखर गया जिनके लिए यूँ, हाथ खाली, हाल भी बदहाल ही थे। स्वप्न प…
नई सड़क - कविता - मयंक द्विवेदी
जैसे सोलह शृंगार कर एक नवनवेली दुल्हन-सी जब गाँव में सड़क आती है बड़े-बुज़ुर्गों, बच्चों, युवाओं— सबके मन को भाती है। कोई कौतूहल में द…
अपने हिस्से का पहाड़ - कविता - मोहित नेगी 'मुंतज़िर'
अल्पायु में ब्याही गई उनकी माऐं उन्हें छोड़ने आई हैं सड़क तक। सुबह की पहली बस से, वे नवयुवा जा रहे हैं रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर। …
छोटी-सी आशा - कविता - मदन लाल राज
बंजर धरती पर अंकुर क्या फूटा! उपजाऊ भूमि भी तिलमिला उठी। जब जुगनू की छोटी-सी आशा से अंधेरे में रोशनी झिलमिला उठी। मदन लाल राज - नई दि…
माशूका- कविता - प्रवीन 'पथिक'
बशर यूँ किसी से बेइंतहा मोहब्बत करता है। जिसके ख़्यालों में, शाम-ओ-सहर; जिसे पाने की चाहत में ताउम्र गुज़ार देता है। फ़कत इतनी आरज़ू …
गद्य मे कविता कह रही है - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
अवगुण सदा रहे हैं, निश्चय भी सदा रहा। लाख बार गिर जाऊँ, फिर उठना है, मन में यह सदा रहा है, निश्चय भी सदा रहा है। भावुक थे निर्णय मस्ति…
विरह का सौंदया - कविता - डॉ॰ सुनीता सिंह
विरह केवल पीड़ा नहीं, यह एक गहन साधना है, जहाँ हर आँसू के भीतर, प्रेम की ही कामना है। तेरे जाने के पश्चात भी, तू मुझमें ही बसा रहा, हर…
एक और अर्थ - कविता - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
कभी-कभी एक स्मृति अपना चेहरा उतारकर हमारी तरफ़ रख देती है, और हम समझते हैं ये हम हैं। पर वो हम नहीं— हमारी सम्भावना होती है, जो किस…
ओ प्यारे मेरे! आँखें खोल! - कविता - साई अनमोल
मैं दीपक तो तुम लौ बन जाना पवमान चतुर तुमको ले लेगी? ना.. ना.. तुम मुझमें ही समाना; अरे प्यारे अब तो जाग ज़रा! दृष्टि कुछ मुझपे डाल ज़रा…
आदमी टूट जाता है - कविता - प्रवीन 'पथिक'
बहुत कुछ टूट जाता है, छूट जाता है; जब आदमी ख़ुद से रूठ जाता है। एक खालीपन से, उसका जीवन भर जाता है। जब वह खो जाता है, किसी का हो जाता …
अवगुण सदा रहे हैं - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
अवगुण सदा रहे हैं, निश्चय भी सदा रहा। लाख बार गिर जाऊँ, फिर उठना है, मन में यह सदा रहा है, निश्चय भी सदा रहा है। भावुक थे निर्णय मस्ति…
प्रकृति से सीख - कविता - उमेन्द्र निराला
नदियाँ बहती हैं, निरंतर बहती हैं। चट्टानों को भी काटकर, मंज़िल पाने को बहती हैं। पर्वत खड़े हैं, सदियों से खड़े हैं। सब कुछ सहकर भी अड…
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