संदेश
मुसाफ़िर - कविता - राहुलदेव गौतम
न जाने क्या कहती है मुसाफ़िरों से ट्रेन की आवाज़ ध्यान से सुनो तो लगता है कुछ पटरियों की तरह पीछे छूट जाते है बीते यादों के लम्हें मोम-…
दशहरे के मेले में - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
दशहरे के मेले में रावण को जलाने वाले लोग, नहीं जला पाते अपने भीतर के रावण को। जो कि देखते हैं हरेक स्त्री को गंदी निगाहों से, जो कि हड…
युवा : मनुष्यता का नया सवेरा - कविता - जयराम यादव
मानव अपनी मानवता की राह भूल जब जाता है, मर्यादा का पावन बंधन पल में ही बिखराता है। करुणा, दया, परमार्थ जब मौन खड़े रह जाते हैं, स्वार्…
स्मृतियाँ भी ले जाओ - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव
रजनी की निस्तब्धता में, जब जग सारा सो जाता है, चंद्र अकेला नभ में बैठा, मेरा दुःख दोहराता है। पलकें मूँदूँ तो तुम दिखतीं, खोलूँ तो अँध…
नशा - कविता - महेश कुमार हरियाणवी
नशा करेगा नाश आस कुछ रखना ना। संपूर्ण हो विनाश भूल कर चखना ना।। रोए नैन का नीर नाग बन डसना ना। बढ़ते रोग अपार मौत तेरी रसना ना।। महेश क…
कैसी चुभन, कहाँ की उलझन - कविता - उमेश शुक्ला
कैसी चुभन, कहाँ की उलझन है रिश्तों के दरम्यान। अपने ही रख नहीं पा रहे अपनो का ही ध्यान।। पहले से बेहतर है जीवन खाने और कमाने में, पहले…
मनुष्य होना - कविता - सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
मनुष्य होना केवल दो पैरों पर चलना नहीं है, न ही ऊँची इमारतें बनाना, समुद्रों को मापना या आकाश को छू लेना। मनुष्य होना एक भावना है, एक …
किन्तु इस क्षण मौन है - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! नियति फिर से मुझे ये, शून्य करने जा रही है... प्रिये! नियति फिर से मुझे ये, शून्य करने जा रही है। शेष है न कोई आशा, यह मुझे सम…
अनकही - कविता - राहुलदेव गौतम
मैंने जाना कि दो लोगों के बीच कोई भी चीज़ हमेशा नहीं रहती सिवाय इस बात के, कि हमारे बीच बहुत कुछ था। मैंने यह भी जाना कि बहुत कुछ, कु…
रोना क्या? - कविता - प्रमोद कुमार
सीखो तुम प्रारब्ध झेलना, चुनौतियों से लड़ना सीखो। हँस कर झेलो दुर्गम दुर्दिन, बाधा पार कर बढ़ना सीखो। बिन संघर्ष के जीवन कैसा, विचलि…
सहनशील धरा - कविता - प्रणव राज
पीड़ा को सहने वाली, बदले में सुंदरता देने वाली, आपदा के वक्त अशांत हो जाती है, फिर से हरियाली देने वाली, स्वयं आहत होने पर भी, नवजीवन …
सोच युवाओं की - कविता - जयराम यादव
नई सोच है, नई डगर है, आँखों में कुछ सपने हैं, अपनी धुन में चलने वाले, मन में अरमान अपने हैं। परंपरा को साथ लिए वे, नित नया सवेरा गढ़ते…
भोर से साँझ तक - कविता - मीनाक्षी पँवार
उगता है सूरज या उगती है भोर, चढ़ता है सूरज या चढ़ता है शोर। बिंदु-सा दिखता पर रहता चहुँ ओर, फैलाकर रंगों को करदे विभोर। चहके हैं पंछी …
वो - कविता - सुनीता प्रशांत
चाहती है वो कभी देर से उठना चाहती है कभी ना जलाऊ चूल्हा न ही जाऊँ पनघट पर भरा घट उठाने चाहती है वो उतारना सारा बोझ जो उसके तन पर नहीं …
क्यों? - कविता - रिंकी
क्यों भी कितना अजीब शब्द है, जो ख़ामोशी में भी शोर मचा देता है। इंसान को अपने ही ख़्यालों से लड़ने पर मजबूर कर देता है, जवाब ढूँढ़ने की आ…
मैं कौन हूॅं? - कविता - जितेन्द्र सिंह राणावत
मैं कौन हूॅं? अनंत शून्यता का एक निभृत आलाप हूॅं। या किसी संतप्त हृदय का मौन विलाप हूॅं।। मैं कौन हूॅं? विरहिणी के नयनों में अटका अश्र…
घोर अंधड़ - कविता - प्रवीन 'पथिक'
हर दिन एक नया सबेरा लिए आता है। पर बात; वही पुरानी होती है। मन में घोर अंधड़, पुरानी स्मृतियाँ, वही विचार एक साथ कौंधता है हृदय में जीव…
शास्त्रों से शृंगार करो - कविता - श्रेया तिवारी
न केवल आभूषण से ही, वरन शस्त्रों का शृंगार करो, चक्र सुदर्शन, वज्र, त्रिशूल और तलवारों से अलंकार करो। बात करें जो न्याय विरुद्ध, तुम उ…
दीप का अंतिम स्वप्न - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव
सूर्य डूबा, साँझ ने जब रात का आँचल ओढ़ लिया, एक अकेला दीप तब भी अँधियारे से जोड़ लिया। बोला— "मुझमें कहाँ सामर्थ्य इतनी, जो तम का…
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