संदेश
अंतिम परीक्षा - कविता - साई अनमोल
जुटी सभा बैठी है मौन ताँक रही यह अबला कौन? सूरज-चार बुझे बैठे देखे ये कौन, जो हैं देखें, विद्वान-मुनि पद पर आसीन सीमाओं में भी बंधते…
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? - कविता - अमृता वर्मा
नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? मन में इतना दर्द छुपाए, औरों पर एहसान जताए, नारी, तुम चुप क्यों रहती हो? ख़ून पिलाकर जिसको पाला, वहीं नर्क…
लेकिन अब नहीं - लघुकथा - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
सुबह-सुबह रमावती के ढाबे पर चाय पीने वाले जमा हो जाते थे। चाय के साथ साथ उन्हें नाश्ते में उबले चने की मसालेदार घुघुनी मिल जाती थी। दु…
चौखम्बा - कविता - मोहित नेगी 'मुंतज़िर'
वे तब निकलती हैं घास के लिए जंगलों को, जब उन्हें दिखने लगती है चौखम्बा के शिखरों पर सुनहरी रौशनी। वे करती रहती हैं काम और निहारती रहत…
स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित'
जेठ की दुपहरी में एक नव यौवना जिसके पीठ पर बंधा बच्चा है सिर पर ईंटे झुलसती हुई गर्म हवाएँ हैं, एक स्त्री कैसे झेल लेती है? ऊपर से घूर…
मालती - कहानी - डॉ॰ धनंजय कुमार मिश्र
गोसाईं गाँव की मिट्टी में एक सोंधी महक थी। वहीं एक छोटी-सी झोंपड़ी में ब्याह के बाद आई थी मालती। चौदह की उम्र में जब वह तेतरी गाँव से …
है नारी हर युग में युग निर्माता - कविता - महेन्द्र सिंह कटारिया
ममत्व भाव पाने को जिसका, सदैव आतुर रहे स्वयं विधाता। शील, शक्ति, सौंदर्य समन्विता, है नारी हर युग में युग निर्माता। स्नेह सुधा बरसा कर…
नवयुग की हम नारी - कविता - प्रमोद कुमार
नव प्रभात अब निकल गया है, कटी रात अंधियारी, अब इतिहास बदलेंगे मिलकर, नवयुग की हम नारी। कालरात्रि दुर्गा बनकर हमने असुरों को मारा, चामु…
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस - कविता - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
वह संघर्ष से सफलता तक, अद्भुत विधान दर्शाती है। नारी का सम्मान ही जीवन, पौरुषता पथ ले जाती है। सोपानों को चढ़ती नारी, कीर्ति पताका लहर…
बिखरे पन्ने - कविता - ऋचा तिवारी
सदियों से होता आया था, आगे भी होता जाएगा। उस युग में तो कान्हा तुम थे, इस युग में कौन बचाएगा॥ प्रतिबिंब बना उस देवी की, उस पल में क्या…
मजबूर-सी औरत - कविता - दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी'
पीठ पर बाँधकर दुपट्टे से सुला रही थी अपने दुधमुँहे बच्चे को अपने नर्म हाथों से थपथपाकर मानों धरती को जगा रही थी। मिट्टी को पसीने से सा…
मन मर गया हो जैसे - कविता - शालिनी तिवारी
एक लड़की जो चहचहाती थी चिड़ियों-सी, अजीब-सी ख़ामोशी ओढ़े है। जिसे ज़िद थी भरी जवानी में बचपना जीने की, उसका बचपना एक ही ज़िंदगी में दो …
मैं स्त्री हूँ - कविता - प्राची अग्रवाल
जानती हूँ मैं अपनी मर्यादा हर वक्त मुझे मत टोको। मर्यादा लाँघने वाली स्त्रियाँ अलग होती है। मुझे उनके साथ मत तोलो। भाषा हूँ मैं मौन की…
स्त्रीत्व - कविता - आलोक गोयल
देवी बनने की चाह नहीं नारी ही मुझको रहने दो, बाँधों से मत रोको अब स्वच्छंद नदी-सी बहने दो। मैं पूजा की वस्तु नहीं इतना भी अभिमान ना द…
स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित'
स्त्री एक आनंद है सकल ब्रह्मांड है तो एक गंभीर, अथक पथिक भी है जो सत्य की खोज में एक अदम्य साहस के साथ अकेले सूनसान! ज़िंदगी की ऊबड़-ख…
मैं नारी हूँ - गीत - उमेश यादव
मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ , मैं देवी हूँ, अवतारी हूँ। अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ, चिंगारी हूँ॥ कल्याणी, भवानी, सीता भी मैं, …
नारी - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा
ईश्वर की अनुपम, अद्भुत कृति, हे सावित्री! सीता, हे सती! हो रानी लक्ष्मी बाई तुम, काली बनकर के आई तुम॥ परहित करने वाली देवी, वीरों…
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