संदेश
मैं लिखूँगा - कविता - देवा यादव
मैं लिखूँगा, और तब तक लिखूँगा, जब तक मेरी उँगलियाँ साथ देगी। जब तक मेरी आत्मा न मात देगी।। मैं लिखूँगा, लिखूँगा वो सब, जो शायद तुम कह…
क़लम का सूर्य - कविता - जयदेव नारायण दास
अज्ञान के घने कुहासे को, जो पल में दूर भगाता है। वो स्याही की हर एक बूँद से, नव भोर का गीत सुनाता है। न झुका कभी जो सत्ताओं से, न भय …
फिर कविता के आँसू निकले - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रश्न अधूरे रहे अकिंचित, पृष्ठ वो सूने-सूने पिघले। स्याही को आभास हुआ तब, फिर कविता के आँसू निकले। सोच रही है अंतिम कविता, क्या मेरा …
घावों का महागीत - कविता - गोलेन्द्र पटेल
तेरी स्मृतियों के धुँधले आँगन में मैं आज भी एक बुझते हुए दीपक की तरह टिमटिमाता हूँ मेरी उँगलियों में अब रंग नहीं बचे फिर भी मैं टूटे ह…
लिखना - कविता - पंडित विनय कुमार
बार-बार कुछ लिखने के बाद बदल जाता है मन का भाव जिसमें होते हैं विचार जिसमें होती हैं सोची गई कल्पनाएँ हर एक कल्पना में होता है सृजन का…
हिंदी का लेखक - कविता - सुरेन्द्र जिन्सी
हिंदी के लेखक कभी सही समय पर नहीं बोलते। वे तब चुप रहते हैं, जब एक पूरी जाति को उजाड़ा जा रहा होता है, जब संविधान की पीठ पर सत्ता अपनी…
लिखूँ तो मैं लिखूँ क्या - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव
लिखूँ तो मैं लिखूँ क्या? जो बोले, पर मौन रहे। जो जल जैसा हो थिर-थिर, पर भीतर ही भीतर बहे। जिसमें रूप न कोई दिखे, ना कोई स्पष्ट रेखा। ज…
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