श्वेता चौहान 'समेकन' - मऊ (उत्तर प्रदेश)
पाप, पुण्य और पगडण्डी - कविता - श्वेता चौहान 'समेकन'
रविवार, अक्टूबर 04, 2026
मैं नहीं जानती,
पुण्य क्या होता है…?
मैं नहीं जानती…!
पाप की सटीक परिभाषा…!
किसी के लिए…
प्रेम पुण्य है,
तो किसी के लिए…!
घृणित पाप…!
हो सकता है,
आपकी कहानी में जो पाप है…
मेरी कहानी में पुण्य हो…!
इसलिए मैं किसी
झमेले में नहीं पड़ना चाहती…
मैं जानना चाहती हूँ—
जादू क्या होता है…?
क्या होती है स्वतंत्रता…?
क्या होता है
सर्वत्र सुरक्षित होना…!
मैं तितलियों की तरह
उड़ना चाहती हूँ!
भौरों की तरह
मँडराना चाहती हूँ!
जुगनुओं की तरह
जलना–बुझना चाहती हूँ।
बारिश में भीगना चाहती हूँ!
चिड़ियों की तरह
चहचहाना चाहती हूँ!
मैं चाहती हूँ…!
जब बारिश की बूँदें धरती पर गिरें,
तो मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू से
मन खिल उठे!
खिल उठें सारी कलियाँ!
खिलखिलाकर हँस पड़ें पौधे!
नदियाँ नृत्य करें!
बादल दौड़ लगाएँ!
पर्वत तन कर खड़े हो जाएँ!
खड़े हो जाएँ सबके हौसले!
हौसले दुनिया जीतने के..!
मैं चाहती हूँ…!
बारिश के लौटने के बाद भी
पगडंडियों पर थोड़ी फिसलन हो!
मैं गिरते–गिरते सँभल जाऊँ!
सँभलकर फिर से गिर जाऊँ!
मैं जानना चाहती हूँ…!
गिरकर सँभलने की प्रक्रिया…!
मैं सीखना चाहती हूँ…!
पाँव की मोच के साथ
लड़खड़ाते हुए चलना…!
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