फिर कविता के आँसू निकले - कविता - राघवेंद्र सिंह
शुक्रवार, जून 26, 2026
प्रश्न अधूरे रहे अकिंचित,
पृष्ठ वो सूने-सूने पिघले।
स्याही को आभास हुआ तब,
फिर कविता के आँसू निकले।
सोच रही है अंतिम कविता,
क्या मेरा अस्तित्व बचेगा?
चला गया वो रचने वाला,
अब मुझको ही कौन रचेगा?
इन आँसू की अंतिम पीड़ा,
अक्षर भी थे समझ न पाए।
आज कलम फिर शून्य हो गई,
वो स्पर्श कहाँ से लाए।
जिन हाथों ने मुझे सँवारा,
आज विदा कर वो हैं फिसले।
स्याही को आभास हुआ तब,
फिर कविता के आँसू निकले।
थपकी देने वाली उंगलियाँ,
पृष्ठों पर थीं मुझे सुलातीं।
आज हुईं वो भी निस्पंदित,
मुझमें थीं जों प्राण जगातीं।
पूछ रही है कविता सबसे,
किसका अब मैं मान बनूँगी।
किसके मन की पीड़ा का अब,
मैं कल्पित परिधान बनूँगी।
निष्प्रभ अर्थ हुए हैं सारे,
इनकी कौन वेदना बदले।
स्याही को आभास हुआ तब,
फिर कविता के आँसू निकले।
कलम हाथ से ऐसे छूटी,
अंतिम बिन्दु लगा न पाए।
मैं भी पूर्ण न हो पाई थी,
अंतिम शब्द भी कह न पाए।
विदा हुआ वो ऐसे, जैसे,
दीपक कोई हुआ निर्वापित।
चरण चूमने अक्षर दौड़े,
श्वासों में जो उनके व्यापित।
मसी-पात्र, स्याही अंतिम क्षण,
कलम, पृष्ठ निज काँधे रख लें।
स्याही को आभास हुआ तब,
फिर कविता के आँसू निकले।
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