गोलेंद्र पटेल - चंदौली (उत्तर प्रदेश)
घावों का महागीत - कविता - गोलेन्द्र पटेल
शनिवार, मई 09, 2026
तेरी स्मृतियों के धुँधले आँगन में
मैं आज भी
एक बुझते हुए दीपक की तरह टिमटिमाता हूँ
मेरी उँगलियों में अब रंग नहीं बचे
फिर भी मैं
टूटे हुए हृदय की तूलिका से
तेरे नाम का आकाश रंगता हूँ
आँखों में जो पानी है
वह सिर्फ़ पानी नहीं
सदियों से दबे हुए पुरुषों का मौन है
स्त्रियों का अपमान है
किसानों की जलती चिताओं का धुआँ है
दलित बच्चे की फटी एड़ियों से रिसता रक्त है
और उन प्रेमियों की राख है
जो दुनिया की अदालत में दोषी पाए गए।
मैं जब भी लिखता हूँ
मेरी क़लम से स्याही नहीं
घाव बहते हैं
हाँ,
मैं घावों को हरा करता हूँ
मैंने देखा है
कि प्रेम सबसे बड़ा युद्ध-विरोधी घोषणापत्र है
दुनिया के सारे युद्धोन्मादियों को
एक बार
युद्धभूमि पर जाने से पहले
अपनी माँ की गोद में सिर रख लेना चाहिए।
जिस दिन कोई सेनापति
अपनी माँ के हाथों की काँपती लकीरों को पढ़ लेगा
उस दिन
तोपों के मुँह में घास उग आएगी
क्योंकि
माँएँ पुत्र नहीं जनतीं
वे पृथ्वी का भविष्य जनती हैं
और कोई भी भविष्य
बारूद पर नहीं टिका होता
लेकिन दुनिया को
रक्त चाहिए
प्रेम नहीं।
दुनिया ने क़ीमत लगाई हर चीज़ की
सोने की
हीरे की
स्त्री की देह की
पुरुष की ताक़त की
यहाँ तक कि आँसुओं की भी
उन्होंने कहा
पुरुष रोते नहीं
और जब मैंने
एक पुरुष को चुपचाप रोते देखा
तो लगा
मानो हिमालय टूटकर
एक बूँद बन गया हो
मैंने उसके आँसू हथेलियों में सहेज लिए
जैसे कोई साधु
गंगाजल सहेजता है
मगर जब उन्हें चखा
तो पाया
दुःख का स्वाद
हर जाति, हर लिंग, हर धर्म में
एक जैसा होता है।
सिर्फ़ समाज की प्रतिक्रियाएँ बदलती हैं
स्त्री रोए
तो उसे कमज़ोर कहो
पुरुष रोए
तो उसे नामर्द कहो
और फिर
दोनों से उम्मीद करो
कि वे तुम्हारे सभ्य समाज को बचाएँ
मैंने एक स्त्री को देखा
जो घर की देहरी से ही
चाँद के दाग़ गिन लेती थी
पर पड़ोस की गली तक अकेले नहीं जा सकती थी।
उसकी कल्पना ब्रह्मांड लाँघ सकती थी
मगर उसकी देह
चार दीवारों से हार जाती थी
पिता
पति
भाई
पुत्र
पितृसत्ता के चार खंभे थे
माँ, सास, ननद
उस इमारत की छत
धर्मगुरु उसकी दीवारें थे
और प्रेमी
उस बंद क़िले में
एक खिड़की खोजता हुआ घायल पक्षी।
मैंने जाना
स्त्री को सबसे अधिक
पुरुषों ने नहीं
उन भूमिकाओं ने बाँटा
जो पुरुषों ने उसके लिए गढ़ीं
माँ बनो—पूजनीय हो
पत्नी बनो—उपयोगी हो
प्रेमिका बनो—संदेहास्पद हो
स्वतंत्र बनो—असभ्य हो
और फिर कहते हैं
हम स्त्री का सम्मान करते हैं।
सम्मान?
जिस समाज में स्त्री को
मनुष्य बनने से पहले
भूमिका चुननी पड़े
वहाँ सम्मान नहीं
सुनियोजित पाखंड होता है
मैं उन सभी स्त्रियों से
सार्वजनिक क्षमा माँगना चाहता हूँ
जिन्हें कविताओं में देवी कहकर
जीवन में दासी बनाया गया
मैंने प्रेम को भी
एक कारख़ाने की तरह चलते देखा है
लोग प्रेम नहीं करते
वे स्वामित्व जताते हैं।
चूमते हैं
जैसे कोई ज़मीन पर क़ब्ज़ा करता है
देहों को जीतते हैं
आत्माओं को नहीं
मैं भी
वासना के उसी रक्तबीज का हिस्सा था
जो हर स्पर्श के बाद
और भूखा हो जाता है
फिर तुम मिलीं
और तुम्हारी आँखों ने
मेरे भीतर बहते हुए विष को
धीरे-धीरे बाहर निकाल दिया।
तुमने मुझे
किसी संत की तरह नहीं
एक घायल मनुष्य की तरह प्रेम किया
और पहली बार
मुझे अपनी ही हिंसा से घृणा हुई
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने शहर छोड़े
ग़ज़लें छोड़ीं
फ़िल्में छोड़ीं
मुस्कुराना छोड़ा
मगर स्मृतियाँ नहीं छोड़ पाया।
स्मृतियाँ
कभी छोड़ी नहीं जातीं
वे भीतर
दूसरा शरीर उगा लेती हैं
तुम्हारे बाद
मेरी हर कविता
एक श्मशान है
जहाँ शब्दों की चिताएँ जलती हैं
मैंने देखा है
भीड़ में चुप रहने वाले लड़के
अक्सर जल्दी मर जाते हैं।
वे
जो रात में तकिये भींचकर रोते हैं
सुबह सबसे ज़्यादा हँसते दिखाई देते हैं
उनकी छाती में
एक पूरा कब्रिस्तान जलता रहता है
वे किसी से प्रेम माँगते नहीं
क्योंकि बचपन से सिखाया गया
मर्द बनो
और “मर्द” बनने की प्रक्रिया में
वे मनुष्य होना भूल जाते हैं
जबकि सच यह है
हर पुरुष के भीतर
एक रोता हुआ बच्चा छिपा होता है
जो बस किसी स्त्री की गोद चाहता है।
माँ
प्रेमिका
मित्र
पत्नी
कोई भी
बस कोई
जो उससे कह सके
रो लो।
लेकिन दुनिया ने
पुरुषों को अधिकार दिए
और स्त्रियों को सहानुभूति
फिर दोनों को अधूरा छोड़ दिया
मैंने किसानों को दिल्ली जाते देखा
और दिल्ली को
उनकी लाशों के ऊपर भाषण देते देखा।
मैंने जाति को
लोगों की ज़ुबान पर नहीं
उनकी आँखों में ज़िंदा देखा
हम जातिवाद नहीं मानते
यह कहते हुए भी
वे पहले अपनी जात बताते हैं
मैंने सभाओं में
समता के नारे लगाए जाते देखे
और उन्हीं हाथों को
रात में नौकर की थाली अलग रखते देखा
मैंने जाना
भारत में
सबसे लंबी उम्र अगर किसी चीज़ की है
तो वह पाखंड है।
फिर भी
मैं लिखता हूँ
क्यों?
क्योंकि जब दुनिया नहीं बदलती
तब कविता
कवि को बदल देती है
उसने मेरे भीतर
इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति की है
मेरे अहंकार पर वज्रपात किया
मेरी क्रूरताओं को बहा दिया
मेरी आत्मा में
दया, प्रेम और क्षमा बो दी
कविता ने मुझे
महान नहीं बनाया
पहले इंसान बनाया
और शायद
इंसान बन जाना ही
सबसे कठिन क्रांति है।
अब जब रात बहुत गहरी हो जाती है
मैं अक्सर सोचता हूँ
क्या सचमुच
अलविदा सिर्फ़ एक शब्द है?
नहीं।
अलविदा
एक पूरी सभ्यता का ढह जाना है
फिर मिलेंगे
मनुष्य की सबसे बड़ी आस्था है
और
अपना ख़्याल रखना
वह वाक्य
जिसने न जाने कितनी आत्माओं को
अंतिम क्षण में बचा लिया होगा
मैं अब भी
तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा नहीं करता
क्योंकि प्रतीक्षाएँ
धीरे-धीरे आत्महत्या बन जाती हैं
मगर हाँ
मैं अब भी यह चाहता हूँ
कि इस पृथ्वी पर
किसी भी आदमी को
रस्सी से गले लगना न पड़े।
किसी भी स्त्री को
अपने ही घर में क़ैदी न होना पड़े
किसी भी किसान को
अपनी मिट्टी पर मरना न पड़े
किसी भी प्रेमी को
जाति के आगे हारना न पड़े
और किसी भी बच्चे को
समय से पहले बड़ा न होना पड़े
यदि मेरी कविताएँ
इनमें से एक भी दुःख कम कर सकें
तो समझना
मेरे सारे घाव
व्यर्थ नहीं गए।
तब शायद
एक दिन
यह संसार
मनुष्यता की ओर लौट आएगा
और उस दिन
मैं पहली बार
अपने घावों को हरा नहीं
भरा हुआ देखूँगा।
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