मत हो मनुज अधीर - कविता - दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी'

मत हो मनुज अधीर - कविता - दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी' | Hindi Kavita - Mat Ho Manuj Adheer - Dilip Kumar Chauhan Baaghi
वरक-तूलिका के संघर्षों से उत्पन्न
कविता है मेरा नाम
दिनकर के खर किरण हूँ
सरसिज की मंद मुस्कान।

नूपुर की कांत ध्वनि
मुरली की मैं तान
लाने आई हूँ शिथिल काया में
पुनः थिरकन और जान।

पर्वत की ऊँचाई हूँ
सागर की गहराई हूँ
मिटाने आई हूँ रातों की स्याही
भोर की मैं लाली हूँ।

सरिता का सतत् प्रवाह
सचल-शीतल समीर
मरहम बन कर आई हूँ
मत हो मनुज अधीर।

दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी' - बलिया (उत्तर प्रदेश)

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