दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी' - बलिया (उत्तर प्रदेश)
मत हो मनुज अधीर - कविता - दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी'
रविवार, अक्टूबर 04, 2026
वरक-तूलिका के संघर्षों से उत्पन्न
कविता है मेरा नाम
दिनकर के खर किरण हूँ
सरसिज की मंद मुस्कान।
नूपुर की कांत ध्वनि
मुरली की मैं तान
लाने आई हूँ शिथिल काया में
पुनः थिरकन और जान।
पर्वत की ऊँचाई हूँ
सागर की गहराई हूँ
मिटाने आई हूँ रातों की स्याही
भोर की मैं लाली हूँ।
सरिता का सतत् प्रवाह
सचल-शीतल समीर
मरहम बन कर आई हूँ
मत हो मनुज अधीर।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

