संदेश
आदमी झुकता वहीं है - कविता - प्रवीन 'पथिक'
आदतन आदमी झुकता वहीं हैं, जहाॅं उसने समय व्यतीत किया हो। समय, जो निरंतर आगे बढ़ता जाता है। हम बीते लम्हों में रुक जाते हैं। चाहते हैं,…
आदमी टूट जाता है - कविता - प्रवीन 'पथिक'
बहुत कुछ टूट जाता है, छूट जाता है; जब आदमी ख़ुद से रूठ जाता है। एक खालीपन से, उसका जीवन भर जाता है। जब वह खो जाता है, किसी का हो जाता …
गिद्ध - कविता - मदन लाल राज
गिद्ध, नोंचने में सिद्ध। दूर-दूर तक प्रसिद्ध। आजकल वह भी सोचने लगा है। मुझ से अच्छा तो आदमी नोंचने लगा है। आकाश में अब बेचारा लुप्त प…
सिर्फ़ मरते हैं यहाँ हिन्दू, मुसलमाँ या दलित - ग़ज़ल - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
सिर्फ़ मरते हैं यहाँ हिन्दू, मुसलमाँ या दलित अब किसी भी जगह पर मरता नहीं है आदमी बँट गए अब तो स्वयं भगवान कितनी जाति में अब सभी की अर्…
आदमी ज़िंदा है - कविता - संजय राजभर 'समित'
मौन रहना– आमंत्रण है शोषण का द्योतक है कायरता का। कभी-कभी एक ग़ुस्सा है एक गंभीर ज्वालामुखी का फटने पर विनाश। कुछ भी हो दोनों में …
आदमियत होने की शर्त लिखता हूँ - कविता - विनय विश्वा
मैं कविता लिखता हूँ इसलिए लोग कहते हैं कवि हूँ पर, मैं एक आदमी हूँ आदमियत होने की शर्त लिखता हूँ जहाँ पर्त खोलने की कोशिशें होती हैं इ…
आम आदमी - कविता - महेन्द्र 'अटकलपच्चू'
जिसका पेट भरा हो, उसको क्या फ़र्क़ पड़ताज़ आम आदमी ही, ग़रीबी में मरता। खा जाते है मोटी तोंद वाले, हक़ हमारा, बची खुची से पेट पालता, मरता क…
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