संदेश
सुना है गाँव में - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
सुना है गाँव में, सुबह के समय, कोयल अब भी कूकती है, टिटहरी सुर मिलाती है, गिनी चुनी चिड़ियाँ, चहचहाती हैं। और सुबह के मौन को तोड़, कह…
रे पागल मन, ठहर जा तू! - कविता - साई अनमोल
मेरे पागल मन! तू पागल मन! ठहर जा तू! ठहर जा तू! क्यों है चाह तेरी नव-जुड़ना? क्यों है चाह तेरी अब मुड़ना? रे क्यों अब भटक रहा तू! ठहर …
स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित'
जेठ की दुपहरी में एक नव यौवना जिसके पीठ पर बंधा बच्चा है सिर पर ईंटे झुलसती हुई गर्म हवाएँ हैं, एक स्त्री कैसे झेल लेती है? ऊपर से घूर…
आत्मग्लानि - कविता - प्रवीन 'पथिक'
सोचता हूॅं, हार जाऊॅं उन लम्हों से, जिनसे लड़ते झगड़ते साल बीते। टूट कर बिखर गया जिनके लिए यूँ, हाथ खाली, हाल भी बदहाल ही थे। स्वप्न प…
नई सड़क - कविता - मयंक द्विवेदी
जैसे सोलह शृंगार कर एक नवनवेली दुल्हन-सी जब गाँव में सड़क आती है बड़े-बुज़ुर्गों, बच्चों, युवाओं— सबके मन को भाती है। कोई कौतूहल में द…
अपने हिस्से का पहाड़ - कविता - मोहित नेगी 'मुंतज़िर'
अल्पायु में ब्याही गई उनकी माऐं उन्हें छोड़ने आई हैं सड़क तक। सुबह की पहली बस से, वे नवयुवा जा रहे हैं रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर। …
छोटी-सी आशा - कविता - मदन लाल राज
बंजर धरती पर अंकुर क्या फूटा! उपजाऊ भूमि भी तिलमिला उठी। जब जुगनू की छोटी-सी आशा से अंधेरे में रोशनी झिलमिला उठी। मदन लाल राज - नई दि…
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