संदेश
डिग्रियों के बोझ तले दम घुटता - कविता - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
डिग्रियों के बोझ तले सपनों का दम घुटता जाता, रोज़गार के सूने पथ पर युवा मन क्यों छटपटाता। भीड़ भरे इस दौर में प्रतिभा मौन खड़ी रोती है…
टेक्निकल बच्चे और मैनुअल बाप - कविता - मदन लाल राज
मैं जिस पीढ़ी में पैदा हुआ, बेटा बाप से सीखता भी था। बाप बार-बार सिखाता था और साथ में रीझता भी था। आजकल का बाप बेटों से मजबूरी में तकन…
प्रतीक्षा - कविता - फैजान अहमद खान
कितना कठिन है प्रतीक्षा करना, राह देखते-देखते थक जाना, फिर मिलने की उम्मीद करना और इसी उम्मीद में पागल हो जाना। ओ मेरे अबोध साथी! कभी …
सभी हैं - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
सभी हैं, कोई भी नहीं। बेकरारी, बेचैनी, कैसे कैसे इंतज़ारी के दुख, फिर से शून्य है, और अंक कोई भी नहीं, सभी हैं, कोई भी नहीं। इस बादल का…
कोरे पन्नों का विवेक - कविता - सतीश धर
मैं कोरे पन्नों पर लिखी जाने वाली कविताओं के बारे में सोच रहा हूँ क्यों नहीं लिखी गईं आज तक इन पन्नों पर कविताएँ। भीड़ में सबसे आगे चि…
अधूरे प्रश्न - कविता - निखिल पाण्डेय श्रावण्य
कितने ऊँचे होने पर भी दिखती हैं मिट्टी और कितने नीचे होने पर भी दिखता हैं असमान? कितने धीरे भागने से हारा जाता है और कितने तेज़ भागने …
टूटे पंख - कविता - नंदनी खरे 'प्रियतमा'
एक चिरैया थी बाग़ों में, अभी तो उड़ना सीख रही थी। अपने कोमल कोमल स्वर में, अभी कुहुकना सीख रही थी। उड़ने को कोशिश में चिड़िया, सारा दिन…
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