दोस्त - कविता - विभा

दोस्त - कविता - विभा | Hindi Kavita - Dost - Vibha. Friendship Poems, Friendship Poetry | दोस्ती पर कविता
बचपन जिसके संग जिया,
पर खिलौना न अपना साझा किया।
जिसके बिन न खेल पाए,
संगी, साथी, हमजोली—
वही तो दोस्त कहलाए।

जीवन का हर पाठ पढ़ा,
तुझ बिन पर मैं न रहा।
कभी माँ, पिता, भाई-बहन के रूप में आए,
दुनिया, ज़िंदगी ने तेरे कितने रूप बनाए—
वही तो दोस्त कहलाए।

तुझ संग जीवन है आनंद,
तुझ बिन फीका है हर रंग।
तेरे ढंग, मेरे रंग,
बस फिर मचा हुड़दंग।
जीना तुझ बिन रास न आए—
वही तो दोस्त कहलाए।

कभी ख़ुशी में शोर मचाए,
कभी ग़म में तू चुप कराए।
मैं कुछ न बोलूँ, पर तू समझ जाए,
मेरे मन की बात तू मुझे बताए—
वही तो दोस्त कहलाए।

कभी भीड़ में खड़ा अकेला,
तुझको ढूँढ़ूँ, तुझको पाऊँ।
कभी अनजाने मदद कर जाए,
और गुमराही में राह दिखाए—
वही तो दोस्त कहलाए।

ज़िंदगी के हर मोड़ पर,
जीवन के हर छोर पर,
तूने नित नए सबक़ सिखाए—
वही तो दोस्त कहलाए।

जीवन की साँझ में, यारों की महफ़िल,
वो घंटों की गपशप, वो चाय की चुस्की,
तेरे रहते अकेलापन भी पास न आए—
वही तो दोस्त कहलाए।

विभा - दिल्ली

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