नए चित्रकार - कविता - बिंदेश कुमार झा
शुक्रवार, मार्च 13, 2026
मकान में नए लोग आने लगे हैं,
दीवार के दाग़ साफ़ होने लगे हैं।
यह दाग़ नहीं है, चित्रकारी है,
इसमें पेंसिल, चौक और किलकारी है।
एक बड़े कलाकार की,
जिसकी उंगली है सुई के आकार की।
बिकती नहीं है ये बाज़ार में,
इन यादों की क़ीमत नहीं हज़ार में।
बचपन कितना महँगा है ना?
एक बड़ा चित्रकार आया है,
कुछ रंगों का डिब्बा लाया है।
दीवारों पर सुंदर दृश्य बनाना है,
खेलते बच्चों का चित्र दिखाना है।
सुगंध नहीं इन तस्वीरों में,
पेंसिल, चौक, मोम नहीं है लकीरों में।
यह पेंटिंग टिकती है बस एक बार,
बड़े होते बच्चे ले आते नए चित्रकार।
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