ज़िन्दगी ने सीखना मुझको सिखाया हार कर - ग़ज़ल - डॉ॰ नेहाल कुमार सिंह निर्मल

ज़िन्दगी ने सीखना मुझको सिखाया हार कर - ग़ज़ल - डॉ॰ नेहाल कुमार सिंह निर्मल | Ghazal - Zindagi Ne Sikhaya Mujhko Haar Kar - Dr Nehal Kumar Singh Nirmal
ज़िन्दगी ने सीखना मुझको सिखाया हार कर,
ख़्वाब सारे टूट बैठे दिल के आँगन पार कर।

जिनके दम से साँस चलती थी वही बेगाने हुए,
अपनी ही परछाइयाँ ठहरीं हमें लाचार कर।

रात भर आँखों में ठहरे दर्द के बुझते चराग़,
सुबह आई ज़िन्दगी हर ख़्वाब को बीमार कर।

जिनसे उम्मीद थी सहारे की किसी मंज़िल पे,
वो ही छोड़ गए सफ़र में हमको मझधार कर।

हँसते चेहरे के तले रोता रहा इक कड़वा सच,
लोग पढ़ते ही नहीं आँखों को अख़बार कर।

ज़िन्दगी ने सीखना मुझको यही आख़िर दिया,
कोई भी अपना नहीं मिलता यहाँ इज़हार कर। 

डॉ॰ नेहाल कुमार सिंह निर्मल - समस्तीपुर (बिहार)

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