ज़िन्दगी ने सीखना मुझको सिखाया हार कर - ग़ज़ल - डॉ॰ नेहाल कुमार सिंह निर्मल
गुरुवार, मार्च 12, 2026
ज़िन्दगी ने सीखना मुझको सिखाया हार कर,
ख़्वाब सारे टूट बैठे दिल के आँगन पार कर।
जिनके दम से साँस चलती थी वही बेगाने हुए,
अपनी ही परछाइयाँ ठहरीं हमें लाचार कर।
रात भर आँखों में ठहरे दर्द के बुझते चराग़,
सुबह आई ज़िन्दगी हर ख़्वाब को बीमार कर।
जिनसे उम्मीद थी सहारे की किसी मंज़िल पे,
वो ही छोड़ गए सफ़र में हमको मझधार कर।
हँसते चेहरे के तले रोता रहा इक कड़वा सच,
लोग पढ़ते ही नहीं आँखों को अख़बार कर।
ज़िन्दगी ने सीखना मुझको यही आख़िर दिया,
कोई भी अपना नहीं मिलता यहाँ इज़हार कर।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

