वैष्णवी पाण्डेय - गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
छोटा-सा कोना - कविता - वैष्णवी पाण्डेय
सोमवार, जनवरी 12, 2026
घर में एक छोटा-सा कोना है
जो मेरा है
जब कभी आशंका और निराशा से
मन आतंकित हो उठाता है
जब कभी पाती हूँ ख़ुद को खड़ा
सवालों के घेरे में तब
हमेशा उस कोने ने मुझे दुलारा है।
बिना किसी प्रश्नचिन्ह के स्वीकारा है मुझे
उसी रूप में जैसे छोड़ गई थी पिछली बार
वहाँ बिखरे रंग
हमेशा रंग लेते हैं मुझे ख़ुद में,
शेल्फ पे रखी किताबें
हमेशा समेट लेती हैं मुझे
और वो गीत
जिन्हें गुनगुनाते हुए ख़ुद-ब-ख़ुद
थिरकने लगते हैं मेरे पाँव
नए सृजन को व्याकुल उँगलियाँ
रचती हैं पेंसिल से नई आकृतियाँ
वो धागे जो सिलती हैं दरारें मन की
घर का वो छोटा-सा कोना जो मुझे
मुझ से भी उन्मुक्त करता है।
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