प्रणव राज - बिहार
सहनशील धरा - कविता - प्रणव राज
शुक्रवार, अक्टूबर 09, 2026
पीड़ा को सहने वाली,
बदले में सुंदरता देने वाली,
आपदा के वक्त
अशांत हो जाती है,
फिर से हरियाली देने वाली,
स्वयं आहत होने पर भी,
नवजीवन देने वाली,
इस धरा पर हम रहते हैं,
सालों-साल हमारी दी हुई
यातनाएँ सहने के बाद भी,
हमें जीवन देने वाली,
इस धरा को मेरा नमन है,
वह धरा, जहाँ विस्तृत आसमान है,
पीने को पानी, खाने को फल,
इसकी सहनशीलता भी ख़त्म होगी,
आज नहीं तो कल।
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