हमारे मीत - गीत - सुशील कुमार
मंगलवार, अक्टूबर 06, 2026
आशा, पीड़ा, प्रेम, विरह जब, काग़ज़ पर नव रूप सँवारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
जब भी जीवन थका अकेला,
भावों ने आ बाहें खोलीं।
स्याही के आँचल में सिमटी,
सुख-दुख की सब भूली बोली।
मन की वीणा झंकृत होकर, गीत सुनाए प्रेम के प्यारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
अक्षर गढ़ते पीर हमारी,
कभी सिसकते, कभी सँवारे।
कुछ ने आँगन ज्योत सजाई,
कुछ ने आँसू और उबारे।
भावनाओं के दीप जले जब, बिखर गए चहुँ दिश उजियारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
कभी हवा सी बहती कविता,
कभी समंदर जैसी गहरी।
दिल के कोमल तारों से ये,
बनती कभी प्रेम की प्रहरी।
राग-विराग सभी संग मेरे, जीवन के ये सुखद सहारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
पथ में चाहे काँटे आएँ,
या हो निशा घनेरी काली।
शब्दों की दुनिया में फिर भी,
रहती मधुरिम धूप निराली।
हम लिखते हैं उम्मीदों को, हर अक्षर हैं प्राण हमारे।
छंद, गीत, ग़ज़लें, मुक्तक, ही मीत बने हैं आज हमारे।
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