सुनीता प्रशांत - उज्जैन (मध्य प्रदेश)
वो - कविता - सुनीता प्रशांत
मंगलवार, अक्टूबर 06, 2026
चाहती है वो कभी देर से उठना
चाहती है कभी ना जलाऊ चूल्हा
न ही जाऊँ पनघट पर भरा घट उठाने
चाहती है वो उतारना सारा बोझ
जो उसके तन पर नहीं मन पर पड़ा है
न ही पहनूँ कोई गहना जो रिश्तों ने मढ़ा है
चाहती है वो पार करना दहलीज़
चाहती है कुलाँचे भरना हरिणी की तरह
न ही करूँ कोई काम बंधुआ की तरह
चाहती है वो बने आकाश की चिरैया
उड़ती रहे मनचाही जगह
न क़ैद कर सके कोई पिंजरे में
चाहती है वो फोड़ना वो निगाहें जो घूरती हैं
चाहती है वो तोड़ना कुछ मर्यादाएँ
न जीऊँ अब किसी के मन से
चाहती वो बन जाए इंसान महज़
औरत आदमी के भेद से परे
जी ले ज़िंदगी एकदम सहज
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