वो - कविता - सुनीता प्रशांत

वो - कविता - सुनीता प्रशांत | Hindi Kavita - Woh - Sunita Prasant. स्त्री पर कविता
चाहती है वो कभी देर से उठना
चाहती है कभी ना जलाऊ चूल्हा
न ही जाऊँ पनघट पर भरा घट उठाने

चाहती है वो उतारना सारा बोझ
जो उसके तन पर नहीं मन पर पड़ा है
न ही पहनूँ कोई गहना जो रिश्तों ने मढ़ा है

चाहती है वो पार करना दहलीज़
चाहती है कुलाँचे भरना हरिणी की तरह
न ही करूँ कोई काम बंधुआ की तरह

चाहती है वो बने आकाश की चिरैया
उड़ती रहे मनचाही जगह
न क़ैद कर सके कोई पिंजरे में

चाहती है वो फोड़ना वो निगाहें जो घूरती हैं
चाहती है वो तोड़ना कुछ मर्यादाएँ
न जीऊँ अब किसी के मन से

चाहती वो बन जाए इंसान महज़
औरत आदमी के भेद से परे
जी ले ज़िंदगी एकदम सहज


Instagram पर जुड़ें



साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos