शास्त्रों से शृंगार करो - कविता - श्रेया तिवारी

शास्त्रों से शृंगार करो - कविता - श्रेया तिवारी | Hindi Kavita - Shaastron Se Shrungaar Karo - Shreya Tiwari
न केवल आभूषण से ही, वरन शस्त्रों का शृंगार करो,
चक्र सुदर्शन, वज्र, त्रिशूल और तलवारों से अलंकार करो।
बात करें जो न्याय विरुद्ध, तुम उनका संहार करो,
प्रहार करो, टकरार करो, गंतव्यो तक तुम प्रहार करो।

कार्य करें जो सृष्टि हेतु, तुम प्रेम पूर्ण व्यवहार करो,
विष्णुजगत में जो अक्षम्य हों, तुम उनको बेकार करो।
जो कहते तुम्हें निर्बल अबला, उन अधरों को निराधार करो,
गिरिजा, लक्ष्मी, सरस्वती की उमदा का अंगीकार करो।

थिरक उठे जो तालो पर, उन घुँघरुओ की तुम झनकार करो,
मीरा, सुभद्रा, लता जी की, सरगम का चित्कार करो।
मात पिता की आँखों के, सपनों को साकार करो,
झूम उठे बाबुल का आँगन, पायल चूड़ी की खनकार करो।

बिंदी, कुमकुम की लाली से, प्रिय के लिए तुम शृंगार करो,
कजरारी आँखों से तुम, फिर उनसे नैनाचार करो।
बात जब भी हो वियोग की, तो प्रेम अश्रु की धार करो,
और जब संयोग की घड़ी बने, तो उनकी ख़ुशियाँ हज़ार करो।

फाड़ दें जो अरियो का वक्ष, ऐसे पुत्रों का उद्गार करो,
अपनी कोमल ममता का फिर, तुम उन पर ख़ूब दुलार करो।
दुश्मन की रूह काँपे, ऐसी आँखों से टकरार करो,
स्त्री होने से जो मिले, ऐसी ख़ैरातों का तुम तिरस्कार करो।

भटक गए हों अपने पथ से, उन युवाओं का तुम सुधार करो,
प्रश्न उठे ख़ुद की हस्ती पर, तो उन पर तुम ललकार करो।
माता, बहन, प्रेमिका, भार्या, इन रूपों में तुम प्यार करो,
न केवल आभूषण से ही, वरन शस्त्रों का शृंगार करो।

श्रेया तिवारी - बस्ती (उत्तर प्रदेश)

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