दीप का अंतिम स्वप्न - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव

दीप का अंतिम स्वप्न - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव | Hindi Kavita - Deep Ka Antim Swapn
सूर्य डूबा, साँझ ने जब
रात का आँचल ओढ़ लिया,
एक अकेला दीप तब भी
अँधियारे से जोड़ लिया।

बोला—
"मुझमें कहाँ सामर्थ्य इतनी,
जो तम का अंत करूँ;
पर जब तक यह श्वास शेष है,
अपना धर्म अवश्य धरूँ।"

वायु आई प्रलय-वेश धर,
लौ से करने युद्ध प्रखर;
दीप हँसा—
"जो सत्य-पथिक है,
उसका भय भी होता नश्वर।"

काजल पीकर ज्योति बनाना,
यही अग्नि का तप होता है;
जो स्वयं पिघलकर मुस्काए,
वही प्रकाश-कल्प होता है।

तेल घटा, बाती झुकने लगी,
रात और गहरी होने लगी;
किन्तु उसी क्षण दूर क्षितिज पर
अरुणिमा मुस्काने लगी।

दीप बुझा—
पर हार न मानी,
उसका स्वप्न अमर हो गया;
जिस उषा की राह निहारी,
वह स्वयं प्रखर हो गया।

जीवन भी उस दीप सदृश है—
क्षणभंगुर, सीमित, लघु, अल्प;
किन्तु ध्येय यदि सूर्य-समुज्ज्वल,
तो मृत्यु भी बन जाती कल्प।

इसलिए हे मन!
तम से लड़ना,
फल की इच्छा त्याग देना;
यदि बन न सको तुम स्वयं प्रभाकर,
तो कम-से-कम एक दीपक बनकर
किसी भटके पथिक को
घर का मार्ग बता देना।


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