मुसाफ़िर - कविता - राहुलदेव‌ गौतम

मुसाफ़िर - कविता - राहुलदेव‌ गौतम | Hindi Kavita - Musafir - Rahul Dev Gautam. मुसाफिर पर कविता
न जाने क्या कहती है 
मुसाफ़िरों से ट्रेन की आवाज़
ध्यान से सुनो तो लगता है
कुछ पटरियों की तरह पीछे छूट जाते है
बीते यादों के लम्हें मोम-सी कहीं दूर
एक पेड़ एक रास्ते जो हमराज़ थे
अब वो नहीं दिखते
क्योंकि हमारे बीच अब अँधेरों की दूरियाँ है
एक काजल की स्याह
जो मुझे ढकी हुई थी
रोक लेने के लिए
लेकिन उसे छोड़ जाना पड़ा
अकेले अपने हिस्से का दर्द सम्हालने
दूसरे शहर...।

राहुलदेव‌ गौतम - ग़ाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश)

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