मौन - कहानी - डॉ॰ धनंजय कुमार मिश्र
गुरुवार, अक्टूबर 15, 2026
सन् 1987 - 88 रहा होगा। दक्षिण बिहार का वह छोटा-सा क़स्बा अब भी क़स्बा कम और जंगल की देह पर उगा हुआ एक विरल-सा गाँव अधिक था। दूर तक फैली पहाड़ियों के बीच, नेतरहाट की तलहटी की ओर से आती ठंडी हवा शाम होते-होते गलियों में उतर आती थी। कच्ची सड़क के दोनों ओर मिट्टी और खपरैल के घर थे। कहीं किसी साहूकार की पक्की हवेली, कहीं बनिए की छोटी-सी दुकान, कहीं चूल्हे से उठता धुआँ और कहीं गोबर से लीपा हुआ आँगन।
क़स्बे के बाहर सरकार एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनवा रही थी।
भवन अभी पूरा नहीं हुआ था। चारदीवारी अधूरी थी, खिड़कियों में चौखटें तो थीं, पर पल्ले नहीं। फ़र्श पर कहीं ईंटें बिखरी थीं, कहीं चूने की सफ़ेदी आधी दीवार तक आकर रुक गई थी। एक कोने में बालू का ढेर था और दूसरे में टूटे बाँस।
वही अधूरा भवन कुछ दिनों से एक स्त्री का घर बन गया था।
उम्र बाईस या चौबीस वर्ष से अधिक न होगी।
किसी ने उसका नाम नहीं पूछा था।
शायद इसलिए कि जिसे समाज नाम देने योग्य न समझे, उससे नाम पूछने की आवश्यकता भी वह नहीं समझता।
वह सुबह कस्बे की गलियों में निकलती। किसी दरवाज़े पर खड़ी होकर हाथ जोड़ देती।
“कुछ खाने को दे दो...”
कहीं बची हुई रोटी मिल जाती, कहीं मुट्ठी भर चूड़ा, कहीं बासी भात। किसी दिन कुछ नहीं मिलता तो वह देर तक किसी दुकान के सामने बैठी रहती। लोग उसे देखते, हँसते, कोई बच्चा पीछे से पत्थर फेंक देता, कोई औरत अपनी देहरी से आवाज़ लगाती—
“चल हट! यहाँ क्यों बैठी है?”
वह उठ जाती।
न शिकायत।
न उत्तर।
न आँसू।
बस धीरे-धीरे लौटकर उसी अधबने भवन में चली जाती।
कुछ लोगों ने उसे पहली बार देखा तो कहा—“पगली है।”
दूसरे ने कहा—“किसी के साथ भागी होगी।”
तीसरे ने बात को और आगे बढ़ाया—“कोई मर्द छोड़ गया है।”
चौथे ने जैसे निर्णय सुना दिया—“ऐसी ही होगी। चरित्रहीन।”
क़स्बे को एक कहानी मिल गई थी।
स्त्री की कहानी जाने बिना।
---
दिसम्बर की सर्दियाँ थीं।
पहाड़ियों से उतरती हवा में ऐसी ठंड थी कि रात को कुत्ते भी किसी दीवार की ओट खोज लेते थे।
वह स्त्री उसी भवन के एक कोने में पड़ी रहती। उसके पास एक फटा हुआ गुदड़ा था, जिसकी रूई जाने कब की निकल चुकी थी। एक मिट्टी का छोटा-सा पात्र था। कभी उसमें पानी रहता, कभी नहीं।
एक दिन कस्बे का बूढ़ा चौकीदार उधर से निकला। उसने देखा, स्त्री दीवार से पीठ टिकाए बैठी थी।
“कहाँ से आई हो?”
स्त्री ने उसकी ओर देखा।
कुछ नहीं बोली।
“नाम क्या है?”
मौन।
“घर कहाँ है?”
मौन।
चौकीदार ने झुँझलाकर कहा—
“पगली!”
और आगे बढ़ गया।
उस रात वह बहुत देर तक उस अधूरे भवन के बाहर बैठी रही।
आकाश में तारे बहुत साफ़ थे।
वह शायद किसी तारे को देख रही थी।
या शायद किसी ऐसे घर को, जो वहाँ था ही नहीं।
---
दिन बीतते गए।
दस दिन।
पंद्रह दिन।
बीस दिन।
अब लोगों को उसके गर्भ का पता चल गया था।
क़स्बे की औरतें कुएँ पर पानी भरते हुए उसकी चर्चा करतीं।
“किसका पाप है, कौन जाने!”
“किसी ने बहला दिया होगा।”
“नहीं, ख़ुद ही भागी होगी।”
“घरवालों ने निकाल दिया होगा।”
“घरवालों ने क्यों निकाला होगा? कुछ किया होगा तभी तो...”
हर अनुमान के साथ उसके जीवन पर एक नया पत्थर रख दिया जाता।
किसी ने यह नहीं सोचा कि वह कहाँ से आई।
किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस आदमी ने उसके गर्भ में बच्चा छोड़ा, वह कहाँ है।
किसी ने यह नहीं पूछा कि वह रात किसकी थी और उसके बाद की सारी रातें केवल उसकी क्यों हो गईं।
समाज को स्त्री का अपराध दिखाई देता है।
पुरुष का नाम अक्सर दिखाई नहीं देता।
---
एक दिन दोपहर को अचानक वह बाज़ार के पास गिर पड़ी।
एक बच्चा चिल्लाया—
“पगली गिर गई!”
लोग जमा हो गए।
वह कुछ क्षण जमीन पर पड़ी रही। फिर उठ बैठी।
किसी ने पानी दिया।
किसी ने नहीं।
एक बूढ़ी भिखारिन ने अपनी पोटली से आधी रोटी निकालकर उसके हाथ में रख दी।
स्त्री ने रोटी को देखा।
बहुत देर तक देखा।
फिर उसे अपने पेट पर रख लिया।
बूढ़ी भिखारिन समझ नहीं पाई।
लेकिन पास खड़ी एक वृद्धा समझ गई।
उसने धीमे से कहा—
“बच्चा भूखा होगा।”
स्त्री ने पहली बार उस दिन मुस्कराने जैसी कोई चीज़ की।
बहुत हल्की।
बहुत क्षीण।
जैसे किसी सूखी डाल पर अचानक कोई अदृश्य कली फूट आई हो।
---
तीन दिन बाद उसकी प्रसव-वेदना शुरू हुई।
रात बहुत ठंडी थी।
अधूरे भवन के भीतर हवा दीवारों के बीच से सीटी बजाती हुई निकल रही थी।
वह एक कोने में सिकुड़ी पड़ी थी।
दर्द की एक लहर उठती तो वह दीवार पकड़ लेती।
उसके मुँह से आवाज़ निकलती, मगर इतनी धीमी कि बाहर से गुज़रने वाला शायद उसे हवा की आवाज़ समझता।
एक बार उसने बाहर जाते हुए एक आदमी को पुकारना चाहा।
“भैया...”
शब्द गले में ही रह गया।
वह आदमी सुनकर भी नहीं रुका।
शायद उसने सुना ही नहीं।
या सुनना नहीं चाहा।
आधी रात बीत गई।
फिर अचानक उस सुनसान भवन में एक बच्चे के रोने की आवाज़ गूँजी।
क़स्बे में कई घरों में लोग जागे।
किसी ने कहा—
“शायद पगली का बच्चा हुआ है।”
फिर लोग सो गए।
सुबह तक बात पूरे क़स्बे में फैल चुकी थी।
लोग देखने आए।
किसी को कौतूहल था।
किसी को तमाशा।
किसी को दया।
और बहुतों को बस यह जानने की इच्छा कि आख़िर वह किसका बच्चा है।
वह स्त्री दीवार से लगी बैठी थी।
बाल बिखरे थे।
चेहरा पीला पड़ गया था।
आँखें धँसी हुई थीं।
गोद में बच्चा था।
वह उसे देख रही थी।
ऐसे जैसे संसार में अब उसके पास देखने के लिए वही एक चेहरा बचा हो।
किसी ने पूछा—
“बाप कौन है?”
स्त्री ने बच्चे को और कसकर सीने से लगा लिया।
मौन।
दूसरे ने पूछा—
“कहाँ का है?”
मौन।
तीसरे ने हँसकर कहा—
“अरे, यह तो पगली है। क्या बताएगी!”
भीड़ में कुछ लोग हँस पड़े।
लेकिन वह स्त्री बच्चे को दूध पिलाने लगी।
उस क्षण उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी, जैसी किसी मंदिर के दीपक की लौ पर होती है।
उसके पास न घर था।
न बिस्तर।
न कपड़ा।
न भोजन।
न भविष्य।
फिर भी वह माँ थी।
और शायद यही उसकी सारी सम्पत्ति थी।
---
दूसरे दिन एक सिपाही आया।
किसी ने थाने में ख़बर कर दी थी।
“एक पगली ने बच्चा जना है।”
सिपाही ने भवन के भीतर झाँका।
“नाम?”
मौन।
“पति?”
मौन।
“गाँव?”
मौन।
“बाप कौन है बच्चे का?”
स्त्री ने बच्चे को देखा।
फिर सिपाही को।
फिर ज़मीन की ओर देखने लगी।
सिपाही ने झुँझलाकर कहा—
“बोलती क्यों नहीं?”
मौन।
“पगली है।”
उसने काग़ज़ पर कुछ लिख दिया।
किसी ने पूछा—
“क्या लिख रहे हैं?”
सिपाही ने कहा—
“अज्ञात स्त्री।”
इतना लिखकर वह चला गया।
इतिहास में उसका नाम वहीं समाप्त हो गया।
“अज्ञात स्त्री।”
---
तीसरे दिन सुबह ठंड कुछ अधिक थी।
क़स्बे के ऊपर धुँध छाई हुई थी।
दुकानें देर से खुलीं।
एक लड़का रोज़ की तरह अधूरे भवन के पास से गुज़रा। उसने भीतर झाँका और अचानक दौड़ता हुआ वापस आया।
“लोगो! पगली मर गई!”
कुछ ही देर में भीड़ जमा हो गई।
वह उसी कोने में पड़ी थी।
शरीर ठंडा हो चुका था।
चेहरा शांत था।
उसकी बाँहें बच्चे के चारों ओर इस तरह लिपटी थीं जैसे मृत्यु के बाद भी किसी से उसे छीन लिए जाने का भय हो।
और बच्चा—
वह जीवित था।
माँ के सीने से लगा हुआ।
धीरे-धीरे रो रहा था।
एक बूढ़ी औरत आगे बढ़ी।
उसने बच्चे को उठाने के लिए माँ की बाँह हटानी चाही।
बाँह नहीं हटी।
वह ठिठक गई।
फिर उसने दूसरी बार कोशिश की।
माँ की उँगलियाँ बच्चे के कपड़े में अटकी थीं।
जैसे मृत्यु से कुछ क्षण पहले तक वह उसे बचाती रही हो।
बूढ़ी औरत की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से कहा—
“अरे... छोड़ भी दे बेटी...”
पर मृत देह ने नहीं छोड़ा।
आख़िर दो और औरतों ने मिलकर उसकी उँगलियाँ अलग कीं।
बच्चा माँ के सीने से अलग हुआ।
और उसी क्षण वह इतनी जोर से रोया कि भीड़ पर जैसे किसी ने अचानक पत्थर फेंक दिया हो।
सब चुप हो गए।
बहुत देर तक।
---
उस दिन क़स्बे में तरह-तरह की बातें हुईं।
किसी ने कहा—“बेचारी भूख से मर गई।”
किसी ने कहा—“ठंड लग गई होगी।”
किसी ने कहा—“कमज़ोर थी।”
किसी ने कहा—“पागल थी।”
किसी ने कहा—“कर्मों का फल है।”
किसी ने पूछा—“बच्चे का क्या होगा?”
किसी के पास उत्तर नहीं था।
थाने से सिपाही आया।
उसने शव को देखा।
कुछ लिख लिया।
फिर पूछा—
“कोई पहचानता है इसे?”
भीड़ चुप रही।
कल तक जिसे पूरा क़स्बा जानता था, आज कोई उसे पहचानने वाला नहीं था।
सिपाही ने फिर पूछा—
“किसी को पता है कहाँ की रहने वाली थी?”
मौन।
“नाम?”
मौन।
उसने काग़ज़ मोड़ा और जेब में रख लिया।
शायद सरकारी रजिस्टर में वह एक और “अज्ञात स्त्री” बनकर रह गई।
---
शाम तक बच्चे के लिए कोई व्यवस्था नहीं हुई।
आख़िर वही बूढ़ी भिखारिन उसे अपनी गोद में लेकर बैठ गई, जिसने कभी उसे आधी रोटी दी थी।
बच्चा बार-बार रोता।
बूढ़ी उसे चुप कराती।
“चुप रे... चुप...”
फिर उसकी आँखें उस अधूरे भवन के कोने की ओर चली जातीं।
वहाँ अब भी वह फटा हुआ गुदड़ा पड़ा था।
मिट्टी का पात्र पड़ा था।
दीवार पर एक जगह उसकी उँगलियों के निशान थे।
और ज़मीन पर सूखे दूध की एक पतली-सी सफ़ेद रेखा।
बूढ़ी की आँखों से आँसू गिर पड़े।
उसने बच्चे को अपने सीने से लगाते हुए कहा—
“तेरी माँ पगली नहीं थी रे...”
वह रुक गई।
गला भर आया।
“पगली तो दुनिया थी...”
और उस अधूरे स्वास्थ्य केंद्र की अधूरी दीवारों के बीच पहली बार किसी ने उसकी ओर से यह बात कही।
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कुछ दिनों बाद भवन का निर्माण फिर शुरू हो गया।
मिस्त्री आए।
मज़दूर आए।
ईंटें लगीं।
दीवारें पूरी हुईं।
खिड़कियों में पल्ले लग गए।
चूना हुआ।
फ़र्श बन गया।
कुछ महीनों बाद वहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुल गया।
लोग आने लगे।
बच्चों का इलाज होने लगा।
औरतें प्रसव के लिए आने लगीं।
दीवार पर सरकार का बोर्ड लग गया।
किसी को याद नहीं रहा कि इन्हीं दीवारों के बीच एक स्त्री ने अपने बच्चे को जन्म दिया था।
किसी को याद नहीं रहा कि इसी भवन के एक कोने में वह भूख, ठंड, अपमान और अकेलेपन से लड़ती रही थी।
किसी को यह भी याद नहीं रहा कि उसने अपने बच्चे का नाम क्या रखा था।
शायद उसने रखा ही नहीं था।
शायद उसके पास नाम रखने का समय नहीं था।
शायद वह जानती थी कि नाम रखने के लिए पहले समाज में जगह चाहिए।
उसके पास जगह नहीं थी।
सिर्फ़ एक बच्चा था।
और उस बच्चे के लिए उसकी आख़िरी साँस तक बची हुई ममता थी।
वर्षों बाद उस भवन की दीवारों पर कई बार चूना पुता।
रंग बदले।
अधिकारी बदले।
डॉक्टर आए और चले गए।
क़स्बा बड़ा हुआ।
सड़क पक्की हुई।
लेकिन उस भवन की एक दीवार के भीतर जैसे एक प्रश्न हमेशा जीवित रहा—
जिस समाज ने उस स्त्री को उसके जीवित रहते कभी मनुष्य की तरह नहीं देखा, वह उसकी मृत्यु के बाद उसके बच्चे को किस अधिकार से अपना कहता था?
उस प्रश्न का कोई उत्तर आज तक नहीं मिला।
क्योंकि उस स्त्री ने जीवन भर कुछ नहीं कहा था।
और मृत्यु के बाद भी—
वह केवल मौन रही।
लेकिन उसका मौन बोलता रहा।
बहुत दूर तक।
बहुत देर तक।
और शायद आज भी।
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