भ्रम - गीत - प्रमोद कुमार

भ्रम - गीत - प्रमोद कुमार | Hindi Geet - Bhram - Pramod Kumar. भ्रम पर कविता
भ्रम हमेशा ही मन में यूँ पलता रहा,
रफ़्ता-रफ़्ता ये जीवन भी चलता रहा।
साथ रहते भी जो पास ना आ सके,
उनकी यादों में बस मन मचलता रहा।

उनके मुखड़े की लाली थी ऐसी खिली,
भोर का जैसे दिनकर हो निकला अभी।
झील के दो कमल से उनके दोनो नयन,
बात गुपचुप किए, मन सुलगता रहा।

दिल वीराना मेरा खिलता उपवन हुआ,
ठहठहाकर वो एक बार हँस क्या दिए।
और सरकाई काँधे से जो ख़ुद ओढ़नी,
सर्द ख़्वाबों में भी मन फिसलता रहा।

ज़ुल्फ़ें बिखरा वो निकले कभी पास से,
उठा शीतल पवन का झकोरा कोई।
तन की ख़ुशबू से मन तो हुआ बावरा,
उलझा ज़ुल्फ़ों में उनकी भटकता रहा।

चलना उनका क़दम-दर-क़दम झूमकर,
अरण्य पथ पर चले मानो गजगामिनी।
हौले-हौले नितम्बों का ख़ुद काँपना,
मीठी धुन पर वो मानो थिरकता रहा।

पास बैठे वो एक दिन कहा प्यार से,
मन का इतना मचलना कहाँ ठीक है।
बात उनकी समझकर लगा सोचने,
कैसे हर मोड़ पर वक्त बदलता रहा।

सपने देखा सतरंगी मैंने जिनके लिए,
अपना समझा था जिन्हें न वो मेरे हुए,
दिन-ब-दिन यूँ ही कटती रही ज़िंदगी,
रात ढलती रही दिन निकलता रहा।


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