स्मृतियाँ भी ले जाओ - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव

स्मृतियाँ भी ले जाओ - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव | Hindi Kavita - Smritiyaan Bhi Le Jaao
रजनी की निस्तब्धता में, जब जग सारा सो जाता है,
चंद्र अकेला नभ में बैठा, मेरा दुःख दोहराता है।
पलकें मूँदूँ तो तुम दिखतीं, खोलूँ तो अँधियारा है,
तुम बिन यह जीवन भी जैसे, स्वयं स्वयं से हारा है।
 
तुम अपनी राह चली जाना, मैं अपनी राह सँभालूँगा,
पर जाते-जाते, हे प्रियतम, अपनी स्मृतियाँ भी ले जाना।

ले जाओ वह प्रथम मिलन भी, ले जाओ वह मधुर हँसी,
ले जाओ वे मधुरिम बातें, जिनमें थी जीवन की ख़ुशी।
ले जाओ वह कोमल स्पर्श भी, जिसकी अब तक आस रही,
ले जाओ वह प्रणय-कहानी, जो अधूरी मेरे पास रही।

तुम अपनी राह चली जाना, मैं मन को समझा लूँगा,
पर जाते-जाते , हे प्रियतम, अपनी स्मृतियाँ भी ले जाना।

तुम्हें दोष दूँ—इतना साहस, मेरे प्रेम में कहाँ रहा?
तुम्हें भुला दूँ—इतना निर्मम, मेरा हृदय कहाँ रहा?
तुम मेरी थीं या नहीं थीं—यह प्रश्न अब भी मौन खड़ा,
पर जितना प्रेम तुम्हें था मुझसे, उससे अधिक मेरा रहा।

तुम अपने नभ में उड़ जाना, मैं धरती पर रह जाऊँगा,
पर जाते-जाते , हे प्रियतम, अपनी स्मृतियाँ भी ले जाना।

कभी रात्रि के अंतिम प्रहर में, यदि मेरा ध्यान तुम्हें आए,
यदि कोई परिचित-सी धुन फिर, बीते दिवसों को दोहराए,
तब यह मत सोचना कि मैं अब भी तुम्हें पुकार रहा हूँ,
मैं तो अपने मौन हृदय में, आज भी तुम्हें सँवार रहा हूँ।

तुम जहाँ रहो, प्रसन्न रहो—यही हृदय की वाणी है,
तुमसे दूर हुआ हूँ, लेकिन प्रीति अभी भी पुरानी है।
दूरी ने संबंध मिटाया, प्रेम नहीं मिट पाया है,
तुमको खोकर भी इस मन ने, तुमको ही अपनाया है।

अब तुम अपनी राह चली जाना, मैं विरह-दीप जलाऊँगा,
रात बहुत है, नींद नहीं है—फिर भी मुस्काकर सो जाऊँगा।
बस इतना-सा उपहार मुझे, अपने जाने पर दे जाना—
मुझसे मेरा प्रेम न लेना, अपनी स्मृतियाँ ले जाना।



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