कैसी चुभन, कहाँ की उलझन - कविता - उमेश शुक्ला

कैसी चुभन, कहाँ की उलझन - कविता - उमेश शुक्ला | Hindi Kavita - Kaisi Chubhan Kahaan Ki Uljhan - Umesh Shukla
कैसी चुभन, कहाँ की उलझन
है रिश्तों के दरम्यान।
अपने ही रख नहीं पा रहे
अपनो का ही ध्यान।।

पहले से बेहतर है जीवन
खाने और कमाने में,
पहले से बेहतर है साधन
कही आने और जाने में,
फिर भी रिश्तों की गलियाँ
पड़ी हुई है सूनसान।
अपने ही रख नही पा रहे
अपनी का ही ध्यान।।

एक वृक्ष था जो फलदाई
कटकर सिमट गया है,
फूल फल पत्ती और टहनियाँ
सबकुछ बँट गया है,
अब तो सूखी जड़े बची है
जिनके पनपने में व्यवधान।
अपने ही रख नहीं पा रहे
अपनो का ही ध्यान।।

कटकर अलग हुए है लेकिन
फिर भी तो खटकन है,
अपने घर में रहकर भी तो
बजते दिखते बरतन है,
अपनो का जब अपने ही
कर जाएँगे अपमान।
तो अपने फिर कैसे रखेंगे
अपनो का फिर ध्यान।।

कैसी चुभन, कहाँ की उलझन
है रिश्तों के दरम्यान।
अपने ही रख नही पा रहे
अपनो का ही ध्यान।।

उमेश शुक्ला - लालगंज, रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

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