जो मुझको हो रहा है उसका चौथाई ही लिक्खा है - ग़ज़ल - प्रशान्त 'अरहत'

जो मुझको हो रहा है उसका चौथाई ही लिक्खा है - ग़ज़ल - प्रशान्त 'अरहत' | Ghazal - Jo Mujhako Ho Raha Hai Uska Chauthaai Hi Likkhaa Hai
तक़ती : 1222  1222  1222  1222

जो मुझको हो रहा है उसका चौथाई ही लिक्खा है,
सबब इस दर्द का हमने तो तन्हाई ही लिक्खा है।

पिता के बाद हक़ हासिल है जिसको सरपरस्ती का,
हमेशा हर जगह उसको बड़ा भाई ही लिक्खा है।

परिंदे उड़ के थक जाएँ मगर छू ही नहीं पाएँ,
तुम्हारे हौसले को ऐसी ऊँचाई ही लिक्खा है।

मुसीबत में खड़े होकर जो केवल लुत्फ़ लेते हैं,
उन्हें अपना नहीं लिक्खा, तमाशाई ही लिक्खा है।

मैं उसके ऐब ढककर सब, भले महबूब लिख देता,
ज़माने ने मगर उसको तो हरजाई ही लिक्खा है।

ये सब किरदार की आराइशों के साज़–ओ–सामाँ है,
सो, तहज़ीब और लहजे को भी रानाई ही लिक्खा है।

जो तुमने भी वफ़ादारी को अपना फ़र्ज़ समझा है,
तो फ़िर तय है मुक़द्दर में तो तन्हाई ही लिक्खा है।


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