दशहरे के मेले में - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मंगलवार, अक्टूबर 20, 2026
दशहरे के मेले में
रावण को जलाने वाले लोग,
नहीं जला पाते
अपने भीतर के रावण को।
जो कि देखते हैं
हरेक स्त्री को
गंदी निगाहों से,
जो कि हड़प जाते हैं
अपने भाईयों के
अधिकार को,
जो कि भरे हुए हैं
अन्दर तक
अहंकार से,
जिनके हाथ नहीं काँपते
ग़रीब आदमी से
रिश्वत लेते हुए,
जिनके लिए
'जनता' का मतलब,
सिर्फ़ 'चारा' है।
उन्होंने ही
दशहरे के मेले पर,
रावण के पुतले को मारा है।
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