मीनाक्षी पँवार - बागपत (उत्तर प्रदेश)
भोर से साँझ तक - कविता - मीनाक्षी पँवार
बुधवार, अक्टूबर 07, 2026
उगता है सूरज या उगती है भोर,
चढ़ता है सूरज या चढ़ता है शोर।
बिंदु-सा दिखता पर रहता चहुँ ओर,
फैलाकर रंगों को करदे विभोर।
चहके हैं पंछी या उठती उमंग,
चल देते हैं सब सूरज के संग।
फिरता है सूरज या फिरता है जग,
पड़ती हैं किरणें या पड़ते हैं पग।
चलना, फिरना, गिरना, उठना,
साँझ ढले तक गतिमय रहना।
ढलता है सूरज या ढलते हैं जन,
थकता है सूरज या थकता है मन,
बुझता है सूरज या बुझता है जीवन।
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