प्रेमिका - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव

जन्मों का वादा था,
राह में ही वो छोड़ गई।
था नाज़ुक सा हृदय मेरा,
जिसको वो तोड़ गई।

प्राण‌ बसे‌ है तुझमें मेरे,
ऐसी बातें करती थी‌।
हर औचत में मेरे वो,
संग-संग मेरे चलती थी।

ना जाने फिर क्या विपदा आई,
बातों को अपनी वो भूल गई।
नाज़ुक सा था हृदय मेरा,
जिसको वो तोड़ गई।

कुछ अरमाँ थे मेरे भी,
ना पास मेरे वो आते हैं।
सुनके इश्क़ का नाम अब,
अंग मेरे सब घबराते हैं।

ना जाने वो कैसी माया थी,
मेरा ग़मों से नाता जोड़ गई।
नाज़ुक सा था हृदय मेरा,
जिसको वो तोड़ गई।

बातें करती प्यारी थी,
बालों को हाथों से सहलाती थी।
करती थी मेरा फ़िक़्र सदा,
बातों से अपने मुझको बहलाती थी।
 
उसके आँखों का मैं प्रेमी था,
मेरे आँखों में वो कुछ ऐसा छोड़ गई।
ना जाने क्या विपदा आई,
हृदय‌ मेरा वो तोड़ गई।

जब मैं शायर बनता था,
वो शायरी बन जाती थी।
जब मैं लेखक बनता था,
वो लेखनी बन जाती थी।

जो इश्क़ का पन्ना उसने खोला,
उस पन्ने को ‌ही वो मोड़ गई।
ना जाने क्या विपदा आई,
हृदय मेरा वो तोड़ गई।

चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव - प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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