अमर निशानी - कविता - मयंक द्विवेदी
शनिवार, मार्च 14, 2026
जब रण में असि ललकार लगाती है,
जब बात स्वाभिमान की आती है,
जब चंद्रहास के अट्टहास पर,
दसों दिशाएँ सो जाती हैं,
तब हाड़ी शीश थाल सजाती है।
जब चूड़ी की खन-खन से जा
तलवारें म्यानों में छिप जाती है
जब एक तरफ़ उजड़े सिंदूरों पर,
अधरों की लाली भाती है,
जब रण रुदन-चीत्कारों पर,
भारी प्रेम-अगन हो जाती है,
जब मोहपाश के बंधन में,
वीरता; माँ का दूध लजाती है,
तब हाड़ी शीश थाल सजाती है।
जब नयनों की अश्रुधारा पर,
नयनों की तीखी धार सुहाती है,
जब रुनझुन-पायल की बेड़ी,
पौरुष के पाँवो में पड़ जाती है,
जब कुल गौरव पर स्याह लगाने,
क़लमें आतुर हो जाती हैं,
तब हाड़ी शीश थाल सजाती है।
जब रणघोषों के उद्घोषों से,
शूरमा भी दहला करते हैं,
शीश कटे गाजर-मूली से,
भुजबल भी पिघला करते हैं,
जब धर्म-प्रेम के द्वंद्व युद्ध में,
कर्तव्य; पथ बहला करते हैं,
तब दे अमर निशानी इतिहासों को,
हाड़ी शीश थाल सजाती है।
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