अधर पर सँवारूँ तुझे - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'जानिब'

अधर पर सँवारूँ तुझे - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'जानिब' | Hindi Kavita - adhar par shawaru tujhe
साँझ की तीर पर बैठकर निहारूँ तुझे,
स्वप्न की ओट से मैं पुकारूँ तुझे।
भाव मेरे सिमटते रहें मौन में,
शब्द बनकर अधर पर सँवारूँ तुझे।

नील अम्बर की पावन परिधि में कहीं,
चाँद जैसे धरे ध्यान-सी तू यहीं।
ज्योति की श्वेत वीणा बजाए पवन,
राग बनकर दिशाएँ निखारूँ तुझे।

तू गगन-सी बसी मेरे नयनों में,
मैं धरा-सा झुका तेरे चरणों में।
जैसे सावन घुला हो सूखे वन में,
वैसे जीवन में आज उतारूँ तुझे।

रात कस्तूरी बन साँस में घुल रही,
चेतना चाँदनी-सी धवल खुल रही।
मन पंखी-सा तेरे गगन में उड़े,
प्राण-पलकों में दीपक उतारूँ तुझे।

तू कमल-सी खिले मंद मुस्कान में,
मैं भँवरा-सा खो जाऊँ तेरे ध्यान में।
रूप तेरे में जैसे बसे ऋतु सभी,
हर ऋतु बन हृदय में सँवारूँ तुझे।

यदि प्रभातों में उषा का अरुणाभ हो,
यदि गगन में अनाहत कोई स्वाभ हो।
जैसे मंत्रों में छिपा ब्रह्म का स्पंदन,
वैसे नयनों में नित्य उचारूँ तुझे।

साँझ की तीर पर बैठकर निहारूँ तुझे,
स्वप्न की ओट से मैं पुकारूँ तुझे।
भाव मेरे सिमटते रहें मौन में,
शब्द बनकर अधर पर सँवारूँ तुझे।


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