प्रकृति से सीख - कविता - उमेन्द्र निराला

प्रकृति से सीख - कविता - उमेन्द्र निराला | Hindi Poem - Prakriti Se Seekh - Umendra Nirala. Hindi Poem About Nature.
नदियाँ बहती हैं,
निरंतर बहती हैं।
चट्टानों को भी काटकर,
मंज़िल पाने को बहती हैं।

पर्वत खड़े हैं,
सदियों से खड़े हैं।
सब कुछ सहकर भी अडिग,
ऊँचाई छूने को खड़े हैं।

सूर्य निकलता है,
हर रोज़ निकलता है।
डूबकर भी वह बिना घबराए,
फिर लालिमा लेकर निकलता है।

और इन सबमें आदमी को
सीखना होगा प्रकृति से—
जीवन में श्रेष्ठता पाने के लिए,
सच्चा मानव बनने के लिए।

उमेन्द्र निराला - सतना (मध्यप्रदेश)

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