संदेश
अंकुरण फिर लौट आए - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे अश्रु दल जब, अंजुरी को भेद पाए। अंकुरण फिर लौट आए। हो गया आँगन सहर्षित, आश्रुओं ने जीत देखी। पल्लवों के स्वप्न जागे, …
फिर भी - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
बहुत भीड़ है, फिर भी तपिश अकेलेपन की। दूर आकाश में, और निर्जन वन में, कोई वैमनस्यों को लेकर, साधक, अपने को साधने चला। वहाँ विवादों की …
भ्रम - कविता - मदन लाल राज
प्याज छीलने वाले को संदेह था कि– छिलके के नीचे छिलका होगा। और प्याज को ये भ्रम है कि– छिलका परत दर परत होगा। एक छीलता है तो दूसरा छिलत…
हे मेरे नन्हें दीपक - कविता - साई अनमोल
हे मेरे नन्हें दीपक तुझे जलना बारम्बार! तम में यह जीवन पला है पलकों पर आँसू गला है, इस पुतली की वर्ती से ही तुझको करना प्यार! तुझे जलन…
ज़िंदगीनामा - कविता - अमृत 'शिवोहम्'
ज़िंदगी क्या है? दिए की लौ का जलना? या तेज़ हवा में लौ का डगमगाना? या डगमगाती लौ को हथेलियों से बचाना? या बचाते-बचाते हथेलियों का जल ज…
छोड़ना - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
'छोड़ना' अति आवश्यक है, नयापन प्राप्त करने के लिए। जब फूल छोड़ते हैं डाली तो वे ईश्वर पर चढ़कर धन्य हो जाते हैं, जब बूँदें छो…
रम्यग्राम - कविता - जितेन्द्र सिंह राणावत
हरित वसन में सजी मेदिनी, प्राची का स्वर्णिम रूप अनोखा। अमराई की सघन छाँव में, मलय पवन का शीतल झोंका। गुंजित हैं खग-वृंद डाल पर, कलरव स…
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