संदेश
मनुष्य होना - कविता - सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
मनुष्य होना केवल दो पैरों पर चलना नहीं है, न ही ऊँची इमारतें बनाना, समुद्रों को मापना या आकाश को छू लेना। मनुष्य होना एक भावना है, एक …
किन्तु इस क्षण मौन है - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! नियति फिर से मुझे ये, शून्य करने जा रही है... प्रिये! नियति फिर से मुझे ये, शून्य करने जा रही है। शेष है न कोई आशा, यह मुझे सम…
अनकही - कविता - राहुलदेव गौतम
मैंने जाना कि दो लोगों के बीच कोई भी चीज़ हमेशा नहीं रहती सिवाय इस बात के, कि हमारे बीच बहुत कुछ था। मैंने यह भी जाना कि बहुत कुछ, कु…
रोना क्या? - कविता - प्रमोद कुमार
सीखो तुम प्रारब्ध झेलना, चुनौतियों से लड़ना सीखो। हँस कर झेलो दुर्गम दुर्दिन, बाधा पार कर बढ़ना सीखो। बिन संघर्ष के जीवन कैसा, विचलि…
सहनशील धरा - कविता - प्रणव राज
पीड़ा को सहने वाली, बदले में सुंदरता देने वाली, आपदा के वक्त अशांत हो जाती है, फिर से हरियाली देने वाली, स्वयं आहत होने पर भी, नवजीवन …
सोच युवाओं की - कविता - जयराम यादव
नई सोच है, नई डगर है, आँखों में कुछ सपने हैं, अपनी धुन में चलने वाले, मन में अरमान अपने हैं। परंपरा को साथ लिए वे, नित नया सवेरा गढ़ते…
भोर से साँझ तक - कविता - मीनाक्षी पँवार
उगता है सूरज या उगती है भोर, चढ़ता है सूरज या चढ़ता है शोर। बिंदु-सा दिखता पर रहता चहुँ ओर, फैलाकर रंगों को करदे विभोर। चहके हैं पंछी …
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