किन्तु इस क्षण मौन है - कविता - राघवेंद्र सिंह

किन्तु इस क्षण मौन है - कविता - राघवेंद्र सिंह | Hindi Kavita - Kintu Is Kshan Maun Hai
प्रिये! नियति फिर से मुझे ये,
शून्य करने जा रही है...

प्रिये! नियति फिर से मुझे ये,
शून्य करने जा रही है।
शेष है न कोई आशा,
यह मुझे समझा रही है।

दोष ना मेरा तुम्हारा,
छल ने ही ये पल सजाया।
दे रही अलगाव नियति,
नियति ने ही था मिलाया।

देखकर इस दृश्य को,
इस क्षण व्यथित विछोह में,
तुम जानती हो कौन है?
विरहमय वह हृदय ही है,
किन्तु इस क्षण मौन है।

जब हमारे ही बिछड़ने,
की घड़ी है पास आई।
हाथ ने भी साथ छोड़ा, 
दृग-जलों ने दी विदाई। 

इस त्वरित पीड़ा के सम्मुख, 
वो अधर भी खुल न पाए। 
थी नदी की शांत लहरें, 
दुःख हमारे धुल न पाए। 

देखकर इस दृश्य को, 
इस क्षण व्यथित विछोह में। 
तुम जानती हो कौन है? 
वेदनामय वह हृदय ही है, 
किन्तु इस क्षण मौन है। 

तुम हमारे प्रीत की, 
लौटा रही हो हर निशानी। 
जैसे कोई मेघ वापस, 
दे रहा धरती को पानी। 

तुम प्रणय के बंधनों से, 
मुक्त मुझको कर रही हो। 
तुम नियति की वीथिका पर, 
पाँव ख़ुद के धर रही हो। 

देखकर इस दृश्य को, 
इस क्षण व्यथित विछोह में, 
तुम जानती हो कौन है? 
द्रवितमय वह हृदय ही है, 
किन्तु इस क्षण मौन है। 


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