डॉ॰ नेत्रपाल मलिक - अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
वसन्त का कैलेण्डर - कविता - डॉ॰ नेत्रपाल मलिक
शुक्रवार, जून 02, 2023
दो तारीख़ों के बीच
बीतते हैं जो युग
उनका फ़ासला भी
दीवार पर टँगा कैलेण्डर
दिनों में बताता है
फिसल जाती हैं जो तारीख़ें हाथों से
चिपकी रह जाती हैं वो भी
कैलेण्डर पर
जन्म लेते हैं हम
जिन तारीख़ों में
स्वयं प्रसव पीड़ा से गुज़रकर
कैलेण्डर उन तारीख़ों के
सोहर गीत नहीं जानता
दीवार पर टँगा कैलेण्डर
फिर से
सूखा पेड़ बन जाता है
वसन्त का कैलेण्डर
मन की खूँटी पर टँगा है।
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