मैं महत्त्वपूर्ण हूँ - कविता - डॉ॰ रेखा मंडलोई 'गंगा' | मज़दूरों पर कविता

मज़दूर दिवस पर मज़दूर वर्ग भी समाज में महत्वपूर्ण हैं इस सम्मान की भावना के साथ उनके महत्व को दर्शाती कविता।

कहने को मैं मज़दूर दीन हीन सा जीवन जी रहा हूँ,
पर दुनिया की सारी ज़िम्मेदारियाँ ख़ुद निभा रहा हूँ।

मैं विधाता से प्राप्त वरदान से अन्नदाता बन गया हूँ,
फिर भी दो वक़्त की रोटी के लिए मैं संघर्ष कर रहा हूँ।

छप्पर की कुटिया में रूखी सूखी रोटी खा रहा हूँ,
अपने देश की समृद्धि की चाहत में पसीना बहा रहा हूँ।

देश से भुखमरी मिटाने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा हूँ,
धरती माँ सोना उगले इसलिए निरंतर हल चला रहा हूँ।

पर्वतों का सीना चीरने के लिए हथौड़ा चला रहा हूँ,
लोगों के रास्ते सुगम बनाने का कार्य सतत कर रहा हूँ।

बाँध, पुल, कल-कारखाने भी तो मैं ही बना रहा हूँ,
स्वेद कण की बूँदों से मैं पावन स्नान कर रहा हूँ।

पैरों के छालों और बिवाई से दुनिया की रंगत बढ़ा रहा हूँ,
कंधों पर ढोते हुए बोझ, धरती माँ का बेटा बना हुआ हूँ।

ग़ुलामी न आती रास अपने हौसलों पर जी रहा हूँ,
सफलता के लिए प्रगति पथ पर बढ़ता जा रहा हूँ।

धरा पर अनमोल हूँ मैं यह विश्वास दृढ़ करता जा रहा हूँ,
हर एक वज्रपात को सह कुंदन सा निखरता जा रहा हूँ।

आत्मबल की प्रबलता लिए कर्म पथ पर बढ़ता जा रहा हूँ,
मानवता ही सच्चा सुख है, यह संदेश देता आ रहा हूँ।

डॉ॰ रेखा मंडलोई 'गंगा' - इन्दौर (मध्यप्रदेश)

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