हरसिंगार - कविता - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'

सायंकाल जब मैं पहुँचा
फूलते हरसिंगार के पास
वह रोनें लगा,
तुम्हारे न रहने के बाद
कौन बुझाएगा मेरी प्यास?
तुम्हारे अन्तिम प्रयाण पर
तुम्हारे शव के साथ
चलेंगे मेरे पुष्प
फिर तुम्हारी स्मृति में
सूख कर मरना मेरी नियति।

शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' - फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

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