तेरी आँचल में - कविता - प्रवीन 'पथिक'

चले यूँ दोनो कदम साथ-साथ,
मंजिल की तलाश में।
जीवन से हँसते बतियाते,
डूबे स्वप्नलोक में।
प्रेम में मत्त।
सांसारिक गतिविधियों से विरत,
एक दूसरे का हाथ थामे;
और गुनगुनाते प्रेम संगीत को।
आशा जगी!
पाने को अँधेरी गलियों में।
आँखों में,
चाहत की दबी थी वासना।
डूबे थे भावों औ विचारों के दलदल में।
मिले तुम उसी क्षण हमको।
प्रेम का प्याला लिए,
दो घूँट पीने के बाद,
एहसास हुआ ऐसे,
जैसे वर्षों से थका हारा;
पाया मैंने,
विश्राम तेरी आँचल में।।

प्रवीन 'पथिक' - बलिया (उत्तर प्रदेश)

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