उपहार - कहानी - पुश्पिन्दर सिंह सारथी

रक्षाबन्धन का समय नज़दीक आने लगा और मोहन अपनी छोटी बहिन को उपहार देने के लिए दिन रात ऑटो चला कर पैसे कमाने मे व्यस्त था। 
जैसे जैसे समय बीतता गया मोहन ये सोचकर परेशान रहता कि अपनी गुड़िया को क्या उपहार दूँ। जिससे कि वह ख़ुशी से झूम उठे। मोहन ने अपना ऑटो बेचकर गुड़िया की पढ़ाई के लिए एक लैपटॉप ख़रीद कर दिया।

गुड़िया- भैय्या, आपने इतना महँगा उपहार मेरी पढ़ाई के लिए दिया। मैं आज बहुत ख़ुश हूँ।

मोहन- मैं अपनी गुड़िया को उसकी ख़ुशी ना दे सकूँ ऐसा हो नहीं सकता।
इतना कहकर मोहन अपने नए काम की तलाश मे निकल जाता है और एक अनाज व्यापारी के पास पल्लेदारी का काम करने लगता है।

एक दिन गुड़िया कुछ सामान ख़रीदने बाज़ार गई। दुकान पर कार्य कर रहे अपने भाई पर जैसे ही गुड़िया की नज़र पड़ी गुड़िया का मन व्याकुल हो उठा। वह समझ गई कि उसके भाई ने अपना ऑटो बेचकर लैपटॉप उपहार में दिया।
गुड़िया बाज़ार से कुछ नहीं ख़रीदती और अपने भाई को इस हालत मे देख कर घर लौट आती है।

शाम को मोहन जब घर आता है:
गुड़िया- भैय्या काम कैसा चल रहा है?
मोहन- कोई ख़ास नहीं चल रहा है बस गुज़ारे लायक ही हो पा रहा है।
बाज़ार की मंदी का असर काम पर पड़ रहा है।
गुड़िया- भैय्या आप कब तक काम करते रहोगे ऐसा?
मोहन- जब तक तुम्हें कामयाब नहीं बना देता।

गुड़िया रात भर अपने भाई के बारे में सोच कर रोती रही कि उसके भाई ने उसकी ख़ुशी के लिए अपना ऑटो बेच दिया।
सुबह होते ही मोहन रोज़ाना की तरह अपने काम पर चला जाता है।

कुछ समय में मोहन का जन्मदिन आने वाला है और गुड़िया अपने भाई को उपहार देने की योजना बनाई। उसने रोज़ मिलने वाले ख़र्च को कम करके पैसा बचाना शुरु कर दिया।

समय बीत गया और मोहन का जन्मदिन आ गया।
गुड़िया- हैप्पी बर्थडे भैय्या।
मोहन चुप रहा क्योकि आज उसके पास अपनी बहिन को कुछ देने के लिए पैसे नहीं थे।
गुड़िया- भैय्या, मुझे कुछ सामान लेने जाना है। आप मेरे साथ चलोगे?
मोहन- ठीक है।

गुड़िया मोहन को लेकर किराने की दुकान पर जाती है। मोहन जैसे ही दुकान को देखता हैं, दुकान का नाम 'मोहन किरान स्टोर लिखा होता है तो वह गुड़िया से पूछ्ता है- ये सब क्या है गुड़िया?
गुड़िया - भैय्या मैंने आपको एक दिन बाज़ार में अनाज से भरी बोरी उठाते हुए देखा तो मैं समझ गई थी कि आपने मेरी ख़ुशी के लिए अपना ऑटो बेच दिया। तब मैंने आपको उपहार में दुकान देने की योजना बनाई।
मोहन- इतना पैसा?
गुड़िया- भैय्या, मैंने आपके द्वारा दिए गए ख़र्च को बचा कर, अपनी कुछ सहेलियों से और कुछ लैपटॉप से काम करके दुकान को ख़रीदा है।

मोहन- पर तुमने ऐसा क्यूँ...?
गुड़िया- भैय्या, माता-पिता के गुज़र जाने के बाद आपने मेरी देखभाल की है। कभी मुझे माता पिता की कमी का एहसास नहीं होने दिया। मैं नहीं चाहती कि मेरा भाई कोई कष्ट उठाए।
इतना कहकर गुड़िया रो देती है।

मोहन- गुड़िया को रोता देख उसे गले लगाकर चुप कराता है और दोनों मिलकर दुकान का शटर खोलते है।
अंदर रखा बर्थडे केक मोहन का इंतज़ार कर रहा था।

जीवन मे कई ऐसे पहलू होते है जहाँ हम महिलाओ को कम समझते है लेकिन हमारी ये मानसिकता ग़लत उस समय हो जाती है जब कोई महिला हमारे लिए अपने जीवन का त्याग करती है।

पुश्पिन्दर सिंह सारथी - अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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