अदृश्य योद्धा - कविता - समय सिंह जौल

कोरोना के ख़िलाफ़
लड़ी जा रही जंग में,
सेनापति के रूप में
अदृश्य योद्धा लड़ रहे संग में।
डटकर खड़े इन योद्धाओं को
ना अच्छा मास्क अस्त्र है,
ना पीपीई किट ना 
आधुनिक सफाई यंत्र है।
बस अकेले हथियार,
झाड़ू से लड़ रहे हैं,
अपनी जान जोखिम में
डाल नालियों में उतर रहे हैं।
बिना थके अपने जीवन को
महामारी के संकट में डाल कर,
बिना बचाव के साधनों के
निर्भयता से लड़ रहे साल भर।
अस्पताल में भी
पहली पंक्ति में खड़े हैं,
नर्सिंग कर्मी डॉक्टर से
पहले बीमारी से लड़े हैं।
कोरोना की जंग में
पीड़ित की मृत्यु होने पर,
शव को एंबुलेंस से लेकर
दाह संस्कार होने तक।
बिना डरे यह योद्धा
सुबह से शाम तक,
कोरोना की जंग लड़ रहा
ना बचाव यंत्रों तक।।
ये सड़कों गलियों नालियों,
कचरा स्थलों पर नज़र आते,
फिर भी ना कोई महत्व
और ना सम्मान पाते।
सफ़ाई सैनिक दिखाई
तो हर जगह दे रहे हैं,
'समय' सियासत के लिए
अदृश्य योद्धा ही रहे है।।

समय सिंह जौल - दिल्ली

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