ज़रूरी तो नहीं - कविता - सन्तोष ताकर "खाखी"

हर कोई एक-सा मिले, यह ज़रूरी तो नहीं।
ख़्वाब, ख़्वाब ही रहे, यह लकीर तो नहीं।।

हर पल लबो पर रब का नाम हो, यह ज़रूरी तो नहीं।
इंसान एक दूजे के काम आए, यह फ़क़ीर तो नहीं।।

हर पल ठहाका लगाती है हैवानियत, यह ज़रूरी तो नहीं।
देख प्यार से सच्चा दिल, इंसान निकले बे-तक़दीर तो नहीं।

लोग मिलने से ही मिलते हो यह ज़रूरी तो नहीं।
एहसासों की दुनिया में अपनेपन की चाहत कोई ज़ंजीर तो नहीं।।

गुस्सा, जुल्म और टकरार बंदिशों में हो, यह ज़रूरी तो नहीं।
हद से ज़्यादा प्यार में सुकून मुकम्मल हो, यह नज़ीर तो नहीं।।

ख़ामोशी की वज़ह दर्द-ए-दिल हो, यह ज़रूरी तो नहीं।
हर चमकते तेज़ पर मुस्कान हो, यह नासिर तो नहीं।।

मैं तो मैं हूँ यह प्रतिबिंब बने, यह ज़रूरी तो नहीं।
हर कोई इत्र सारे मुझसे रखें, यह तासीर तो नहीं।।

सन्तोष ताकर "खाखी" - जयपुर (राजस्थान)

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