कोरोना का क़हर - कविता - राम प्रसाद आर्य

कम नहीं हो रहा, कोरोना का क़हर,
परेशां हर गली, गाँव हो या शहर।
मास्क मुँह हर किसी के, है चारों पहर,
फिर भी बीमार बढ़ते, बढ़ रही मृत्यु दर।।


दूरियाँ बढ़ गयी, परस्पर इस कदर,
अपने अपनों से ही मिल रहे डर ही डर।
धो रहे हाथ भी हम कई बार दिन भर,
पर कहाँ हो रहा कम कोरोना का असर।।


रोजी-रोटी को भटका युवा दर-ब-दर,
जो था रोजी में वो भी आ गया आज घर।
बन्द कॉलेज, दफ्तर, महीनों मगर,
कोरोना के कहर में कमी की ना ख़बर।।


खोज पाया ना कोई, दवा, डॉक्टर,
सावधानी भी सारी सामने बेअसर।
टिकती लम्बी न इतनी महामारी भी गर,
सायद कुदरत का उगला कोई ये ज़हर।।


देखा न अब तक ऐसा  कोई जुकाम-ज्वर,
दवा जिसकी न कोई, ना वैद कोइ ना डॉक्टर।
कोरोन्टाइन न कोई, ना आइसोलेट मगर,
स्वस्थ सब, सायद बिरला गया कोइ ही मर।।


दिवश भर परिश्रम हर पसीने से तर,
रात आराम नहीं, बस कोरोना का डर।
मरीज का तो खुदा मात्र यहाँ डाक्टर,
वही मजबूर, बेबस, खुद बीमार, कइ गये मर।।


ऐ सांईं मेरे! अब तो रोक ये क़हर,
बन्द कर कारखाना कोरोना इस जहर।
जग सकल ही गया गर कोरोना कर उजर,
कौन फिर बोलेगा बोल, महादेव हर हर?


राम प्रसाद आर्य - जनपद, चम्पावत (उत्तराखण्ड)


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